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शिवरुद्राष्टक: महादेव का अमोघ स्रोत्र



देवाधिदेव महादेव का योगी स्वरुप को दर्शाता चित्र 


मित्रों, आप लोगो के द्वारा दिया जा रहा प्रेम और स्नेह मुझे विश्वास दिला रहा है कि यह वेबसाइट आपकी उम्मीदों के अनुसार कार्य कर पा रही है।
पिछले दिनों मैंने श्री कागभुशुण्डि जी के बारे में लिखा था। उसमें एक जगह  भगवान महादेव की अमोघ स्तुति शिवरूद्राष्टक के बारे में लिखा गया था जिसका पाठ करने से  भगवान शिव की कृपा तुरंत प्राप्त होती है तथा हमारा मन-मष्तिष्क सकारात्मक ऊर्जा से भर उठता है।

आपमें से अनेक पाठकों के अनुरोध मुझे प्राप्त हो रहे हैं कि इस  स्त्रोत के बारे में विस्तृत रूप से लिखूं।
यकीन मानिए।मैंने लिखना चाहा, पर हिम्मत नहीं जुटा पाया। शिव की भक्ति को शब्दों में समेटना असंभव है।मैंने सारे अनुरोधों को हाथ जोड़कर किनारे कर दिया।

लेकिन, एक पाठक ने गजब का आग्रह कर डाला! उन्होंने कहा -" जो जी में आये,बस लिख डालो!जबतक लिखोगे, शिव का ही स्मरण होगा! जो भी लोग तुम्हारा लिखा पढ़ेंगे, उतनी देर शिव को ही याद करेंगे!!शिव कृपा से ही उनका स्मरण करने का मौका मिलता है।" उनकी बात मुझे अकाट्य लगी। महादेव को याद करके मैंने कलम उठाई।जो होगा देखा जाएगा!


चलिये, आज बात करते हैं श्री रुद्राष्टक स्रोत्र के बारे में जो देवाधिदेव महादेव की स्तुति में गोस्वामी तुलसीदास जी के द्वारा  लिखा गया है। आठ श्लोकों का यह स्त्रोत श्रीरामचरितमानस के उत्तर कांड में है। इसके पाठ से  देवाधिदेव महादेव की कृपा प्राप्त होती है। देवों के देव, अर्थात देवाधिदेव महादेव को प्रसन्न करने वाली  भावनाओं से भरी यह स्तुति अद्वितीय है, अनूठी है और तमाम मानसिक कष्टों में शीघ्र असर करने वाली है।

आइये, पहले संक्षिप्त रूप में इसकी पृष्ठभूमि जान लें। इसके बारे में मैंने इसी वेबसाइट पर श्रीकागभुशुंडि पर लिखे गए लेख में विस्तृत रूप से चर्चा की है।आपसे अनुरोध है कि आप उस लेख को पहले पढ़ लें।इसका लिंक है-Shri Kagbhusundi

यहां पर मैं उन घटनाओं को संकेत रूप में serial wise लिख रहा हूँ!

उज्जैन।शिव मंदिर।उसमें पूजा करते हुए श्रीकागभुशुंडि।गुरु का आगमन।कागभुशुण्डि द्वारा गुरु का अपमान।महादेव का क्रोध।भोलेनाथ का कागभुशुण्डि को भयंकर श्राप।
अब यहां से आगे चलते हैं।

दोस्तों, जरा  एक पल के लिए कल्पना करके देखिए!उस समय कागभुशुण्डि जी की मनोदशा क्या रही होगी, जब उन्हें महादेव ने श्राप दिया था!साक्षात महादेव जिससे नाराज हो जाएं, ऐसे व्यक्ति को पूरे विश्व में कोई नहीं बचा सकता।

लेकिन यहां एक बात ध्यान देने की है! ईश्वर के द्वारा अथवा ईश्वर को अपना सर्वस्व अर्पित कर चुके महापुरुषों के द्वारा जो भी श्राप या वरदान दिए जाते हैं, वह आगे जाकर समाज के लिए कल्याणकारी सिद्ध होते हैं। भगवान भोलेनाथ के द्वारा दिया गया यह भयानक श्राप भी शिवरुद्राष्टक जैसे मंगलकारी स्त्रोत्र की रचना का तथा श्रीकागभुशुंडि जैसे महान रामभक्त के उदय का कारक बना।
अब वापस आते हैं उस क्षण में जब महादेव के मंदिर में खड़े श्रीकागभुशुंडि अवसाद, घनघोर निराशा और पश्चाताप में डूबे हुए थे। उसी समय उनके महान गुरुदेव ने शिवरुद्राष्टक की रचना की और इसी स्त्रोत्र के द्वारा भगवान शिव का अभिषेक किया।महादेव उनकी भक्ति के आगे विवश हो गए और उन्होंने श्रीकागभुशुंडि के श्राप में परिवर्तन करके उसे पूरे विश्व के लिए  मंगलकारी बना दिया।
मित्रों, भक्तियोग का एक सिद्धांत यहां जानने योग्य है। जो भक्त अपने द्वारा रची गयी स्तुति से ईश्वर की स्तुति कर सके, उसमें विकट परिस्थितियों को भी अनुकूल बनाने का सामर्थ्य होता है। उनके द्वारा किसी परिस्थिति विशेष में रचित ये प्रार्थनाएं और स्तुतियाँ आगे जाकर असंख्य लोगों द्वारा प्रयोग की जाती हैं और पूरा विश्व इनसे लाभ उठाता है। उदाहरण के लिए राक्षसराज रावण ने शिवतांडव स्त्रोत्र की रचना तब की थी जब वह कैलाश का बोझ सहने में असमर्थ हो गया। शिवमहिम्न स्तुति की रचना गंधर्वों के राजा पुष्पदंत ने तब की थी जब उसकी शक्तियाँ नष्ट होकर बंदी बनने का संयोग आ गया। किसी खास परिस्थिति में रचित ये स्तुतियाँ आज बहुत लोकप्रिय हैं।

शिवरुद्राष्टक एक ऐसी ही अमोघ स्तुति है जिसमें किसी भी श्राप को वरदान में बदल देने की शक्ति विद्यमान है। आप खुद अंदाज़ लगा लीजिए, यह स्त्रोत्र सुनकर क्रोध में भरे महादेव का हृदय भी पिघल गया। वे प्रसन्न हो गए! फिर कौन सी ऐसी बाधा है जो इस स्त्रोत्र के विधिवत चिंतन, मनन और पालन से दूर नहीं हो सकती!

अनेक ग्रंथों में बिखरे हुए कई प्रसंगों एवं सूत्रों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि यह स्त्रोत्र अपने आप में बहुत सारी ऐसी बातों को छिपाए हुए है जो इसका सतही तौर पर अध्ययन करने पर नजर नहीं आतीं। यह स्तुति किसी भी व्यक्ति की मानसिक मनोदशा को पूर्णतः बदल देने में सक्षम है। अवसाद, चिंता, क्रोध और पश्चाताप से जूझ रहे लोगों के लिए यह स्तुति एक अचूक मनोवैज्ञानिक दवा है। जिस तरह दवा के chemical composition और working mechanism को न जाननेवालों पर भी दवा अपना पूरा असर दिखाती है। ठीक उसी तरह, यह स्त्रोत्र भी हर उस व्यक्ति पर मनोवैज्ञानिक असर दिखाता है जो इसका भावपूर्ण पाठन, चिंतन और मनन करते हैं।

यह एक बड़ा आध्यात्मिक रहस्य है, जिसे हमें जानना चाहिए कि भगवान के भक्तों द्वारा रची गयी स्तुतियों में अथाह शक्ति होती है। क्यों होती है? क्योंकि इनकी रचना भक्त उस मनोदशा में करता है जब वह अपने आराध्य से मन-प्राणों से एकाकार होता है।योग विज्ञान में इस अवस्था को भावसमाधि की अवस्था कहा गया है। संसार के सभी धर्मों में हमें ऐसी स्तुतियाँ देखने को मिलती हैं जिनके पाठ, चिंतन और मनन से हमारे अंदर मनोवैज्ञानिक परिवर्तन शुरू हो जाते हैं।ये परिवर्तन आगे जाकर पूरे व्यक्तित्व को ही बदलकर रख देते हैं।

शिवरुद्राष्टक एक मामले में बड़ा विशिष्ट है।यह उन लोगों के लिए बहुत उपयोगी है जो जीवन रूपी युद्ध में हार का सामना कर रहे हैं। उदाहरण के लिए हम देख सकते हैं कि आज के कॉरपोरेट corporate जगत की गलाकाट प्रतिस्पर्धा एवं नौकरियों में असुरक्षा यहां कार्यरत व्यक्तियों के मन में क्रोध, निराशा, चिंता, पश्चाताप आदि नकारात्मक प्रवृत्तियों को बढ़ाती है।

यह जानने योग्य बात है कि मनुष्य का मन positivity अर्थात सकारात्मकता के लिए naturally programmed होता है। जब इस मन में नकारात्मक विचार घुसते हैं तो मन प्रतिक्रिया दिखाना शुरू करता है। ठीक वैसे ही जैसे आप अपने घर में सांप के घुसने पर प्रतिक्रिया दिखाते हैं! नकारात्मक और सकारात्मक विचारों का यह संघर्ष हमारे शरीर में अनेक मनोदैहिक रोगों को जन्म देता है। गर्दन दर्द, पीठ दर्द, कमर दर्द, कब्जियत, बेचैनी, तनाव आदि इन्हीं मनोदैहिक रोगों के उदाहरण हैं, जिनसे आजकल लाखों लोग जूझ रहे हैं।

यह अत्यंत दुखद है कि इन मनोदैहिक रोगों के उपचार हेतु लोग उन hospitals में जाते हैं, जहाँ केवल उनके शारीरिक लक्षणों के आधार पर दवा दे दी जाती है! उस आहत मन पर शायद ही कोई ध्यान दे पाता है जिसकी वजह से शरीर में ये लक्षण दिख रहे हैं!!!
काश!कोई ऐसा hospital भी होता!जहां टूटे, थके, धोखा खाये,चिंतित,क्रोधित, तनाव ग्रस्त मन(mind) का इलाज करके उसे निर्मल, शांत, एकाग्र और प्रसन्न बनाया जा सकता!!है न अच्छा विचार!शायद भविष्य में ऐसा जरूर संभव हो जाएगा।

लेकिन चिंता की कोई बात नहीं।हमारे पास शिवरुद्राष्टक जैसे स्त्रोत्र मौजूद हैं जो हमारे आहत मन को शक्तिशाली और स्वस्थ बनाने में पूर्णतया सक्षम हैं।
शिवरुद्राष्टक का पाठ कौन कर सकता है? कोई भी मनुष्य इसका पाठ कर सकता है।महादेव सबके हैं।केवल पाठमात्र से ही आप इस स्त्रोत्र के अधिकांश लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

शिवरुद्राष्टक का पालन कौन कर सकता है? जो इसे समझ जाए।इस स्तुति को अच्छी तरह समझने के लिए श्रीरामचरितमानस का श्रद्धापूर्वक अध्ययन अनिवार्य है। श्रीरामचरितमानस में जगह-जगह बिखरे हुए अनेक सूत्रों को जोड़कर ही इस स्त्रोत्र का सम्पूर्ण अर्थ समझ में आता है।

आइये, अब सारी बातों को छोड़कर इस महान स्त्रोत्र के पाठ पर ध्यान केंद्रित करें। यहां मैं हर श्लोक में से एक शब्द को लूंगा और उसका भावार्थ लिखता चलूंगा। इससे इस बात की झलक मिलती है कि ऊपर से छोटा नजर आनेवाला आठ श्लोकों का यह स्त्रोत्र वास्तव में अत्यंत गहन और विशाल अर्थ रखता है।

                                                                       श्रीशिवरुद्राष्टक

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं
विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम्।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं
चिदाकाशमाकाशवासं भजेहम्।1।
नोट- मित्रों, इस श्लोक पर एक पूरा लेख भी कम पड़ेगा! यहां एक शब्द पर ही दो पंक्तियां लिखूँगा। इसमें महादेव को "चिदाकाशमाकाशवासं" अर्थात चैतन्य आकाशरूप कहा गया है। जिस तरह आकाशतत्व space सभी जगह मौजूद है, वैसे ही शिव सर्वत्र हैं।जरा ध्यान से सोचिए! हमारे मन की भी ये क्षमता है।यह क्षणमात्र में ही कहीं भी पहुंच सकता है। यह श्लोक हमें अपने मन को शिव अर्थात कल्याण के साथ जोड़ने को प्रेरित करता है।


निराकारमोङ्कारमूलं तुरीयं
गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम्।
करालं महाकालकालं कृपालं
गुणागारसंसारपारं नतोहम्।2
नोट- यहां महादेव को "गिराज्ञानगोतीत"  अर्थात वाणी ,ज्ञान और इंद्रियों से परे कहा गया है।मतलब बाहुबल, धनबल और विद्याबल से महादेव नहीं मिलते।उनसे जुड़ने के लिए तन, मन एवं धन का अहंकार छोड़ना पड़ेगा।

तुषाराद्रिसंकाशगौरं गभिरं
मनोभूतकोटिप्रभाश्री शरीरम्।
स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चारुगङ्गा
लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजङ्गा3
नोट- यहां महादेव के मस्तक पर "लसद्भालबालेन्दु " मतलब द्वितीया का चंद्र बताया गया है। यहां एक बात ध्यान देने की है। यहां यह चंद्र हमारे मन का प्रतीक है।जैसे चंद्रमा बढ़ता-घटता है, वैसे ही हमारी मानसिक स्थिति बदलती रहती है। लेकिन महादेव के माथे पर जो चंद्र है,वह द्वितीया का है।स्थिर है।देखने में सुखदायक है। यह दर्शाता है कि हमारी मानसिक स्थिति हमेशा स्थिर, सकारात्मक और प्रसन्नता को बढ़ानेवाली होनी चाहिए। योगविज्ञान में इस तथ्य को मस्तक में स्थित आज्ञाचक्र के concept द्वारा बताया गया है। भारत के प्राचीन ज्योतिष में भी चंद्र को मन का प्रतीक बताया गया है।

चलत्कुण्डलं भ्रूसुनेत्रं विशालं
प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम्।
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं
प्रियं शङ्करं सर्वनाथं भजामि4
नोट- इस श्लोक में महादेव को "सर्वनाथ" अर्थात सबका कल्याण चाहनेवाला बताया गया है। एक प्रसन्न और सकारात्मक विचारों से भरा मन भी सबका कल्याण चाहता है। मन की यह सकारात्मकता और प्रसन्नता 'शिव'चिन्तन अर्थात कल्याणकारी चिंतन से प्राप्त होती है।

प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं
अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशं।
त्र्यःशूलनिर्मूलनं शूलपाणिं
भजेहं भवानीपतिं भावगम्यम्॥
नोट-इस शब्द में महादेव को "भावगम्य" अर्थात प्रेम से प्राप्त होनेवाला बताया गया है। इस शब्द में एक रहस्य है। देखिए। मान लीजिए, आपने शिव से प्रेम किया। इससे क्या होगा? प्रेम से समर्पण की भावना जागृत होगी।समर्पण से कर्तव्यबोध आएगा।कर्तव्यबोध से कर्मों में कुशलता आएगी।कर्मों में कुशलता से मानसिक शांति और बल प्राप्त होगा। यह शिवकृपा है।


कलातीतकल्याण कल्पान्तकारी
सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी॥
चिदानन्दसंदोह मोहापहारी
प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी॥
नोट- यहां महादेव को "सज्जनानंद दाता" अर्थात सज्जनों को आनंद देनेवाला कहा गया है। जो सच को पसंद करे, वो सज्जन है। यहां एक रहस्य छिपा है! देखिए! महादेव की कृपा सबपर होती है, चाहे वो व्यक्ति अच्छा हो या बुरा। रावण और अंधकासुर जैसे राक्षसों पर भी महादेव ने कृपा की थी क्योंकि वो अपनी भक्ति में सच्चे थे। लेकिन उनकी कृपा का सच्चा लाभ वही उठा सकता है जो सज्जन अर्थात सत्य के प्रति आस्थावान हो।

न यावद् उमानाथपादारविन्दं
भजन्तीह लोके परे वा नराणाम्।
न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं
प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं॥
नोट- यहां महादेव को "सर्वभूताधिवास" अर्थात सभी जीवों के अंदर निवास करनेवाला बताया गया है।इसका अर्थ यह है कि सभी मनुष्यों के मन एक ही तत्व "शिवतत्त्व" से बने हैं।अगर हम अपने मन को समझ लें, तो दूसरों का मन भी समझ सकेंगे।हमारे मन पर उन सभी मनों minds का प्रभाव पड़ता है जो दैनिक जीवन में हमारे संपर्क में आते हैं। इसी कारण से सामाजिक व्यवहार में यह कहा जाता है कि हमें किसी का दिल नहीं दुखाना चाहिये। पश्चिमी साहित्य में  चर्चित Law of karma एवं भारतीय संस्कृति का कर्मबन्धन का सिद्धांत इसी तथ्य से जुड़े हैं।



न जानामि योगं जपं नैव पूजां
नतोहं सदा सर्वदा शम्भुतुभ्यम्।
जराजन्मदुःखौघ तातप्यमानं
प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो।8।
नोट- इस श्लोक में भक्त का महादेव रूपी परम सत्ता के प्रति समर्पण दिखाया गया है। इसमें योग, जप, पूजा आदि का ज्ञान आवश्यक नहीं है। केवल श्रद्धा चाहिए। योग के सिद्धांतों के अनुसार जैसे ही व्यक्ति किसी परमसत्ता के प्रति समर्पण करता है, वैसे ही उसके चिंतन की दिशा बदल जाती है।यह दिशा नकारात्मक से बदलकर सकारात्मक हो जाती है। सकारात्मक चिंतन आगे चलकर जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाता है।

दोस्तों, यह स्त्रोत्र Youtube के अनेक Channels पर शब्दार्थ सहित बड़े सुंदर रूप में मौजूद है। आपसे अनुरोध है कि इसे सुनें और अपने जीवन में स्थान दें।

अंत में मैं उन सभी पाठकों का धन्यवाद करता हूँ जिनकी प्रेरणा से ये लेख लिखा गया।देवाधिदेव महादेव को प्रणाम करता हूँ जो भारतीय संस्कृति के कण कण में बसे हैं।


मित्रों, आज बस यहीं तक।उम्मीद है, यह लेख आपके लिए उपयोगी सिद्ध होगा।कामना करता हूँ कि महादेव की कृपा हम सभी पर बनी रहे।आपकी अपनी वेबसाइट www.ashtyaam.com की ओर से हार्दिक शुभकामनाएं।










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