Skip to main content

आइये, समझें वैदिक शिक्षा प्रणाली को: Let us understand Vedic Education System



दोस्तों, विश्वास है आप सभी सकुशल और सानंद हैं।
आज हम यौगिक मनोविज्ञान के ऊपर आधारित प्राचीन गुरुकुलों की शिक्षा पद्दति पर बात करेंगे और देखेंगे कि इसे आधुनिक शिक्षा पद्दति में शामिल करके कैसे विद्यार्थियों के लिए सर्वोत्तम परिणाम हासिल किए जा सकते हैं।

आइये, शुरू करें।

श्रीरामचरितमानस की एक चौपाई है- "गुरु गृह गए पढन रघुराई, अल्प काल विद्या सब पाई"।
"मतलब?"
" जब रघुनाथ जी गुरु के घर अर्थात गुरुकुल पढ़ने गए तो उन्होनें अल्प काल में ही सारी विद्याएं प्राप्त कर लीं।"

अत्यधिक कम समय में ही शास्त्र और शस्त्र विद्याओं में पारंगत होने का ही प्रभाव था कि रघुनाथ जी महर्षि विश्वामित्र की नजरों में आये। उन्हें महर्षि ने अपने आश्रम की सुरक्षा का जिम्मा सौंपा और आगे जाकर अपनी युद्धकला भी सिखाई। महर्षि वशिष्ठ का सम्पूर्ण शास्त्रज्ञान और महर्षि विश्वामित्र का सम्पूर्ण शस्त्रज्ञान श्रीराम में समाहित हो गया। इस तरह वह इस पृथ्वी के तीसरे ऐसे व्यक्ति बने जो शास्त्र और शस्त्र इन दोनों ही क्षेत्रों में चरम सीमा का ज्ञान रखते थे। उनके अलावा अन्य दो व्यक्ति थे- परशुराम और रावण।

आइये, अब प्राचीन गुरुकुलों की शिक्षा पद्दति के बारे में जानें, जो अव्वल दर्जे के विद्वान, व्यापारी ,शासक और योद्धा तैयार करती थी।

सबसे पहली बात।सारे गुरुकुलों का संचालन किसी न किसी ऋषि या महर्षि द्वारा ही किया जाता था। ऋषियों का ये वर्ग शासकवर्ग से उच्च माना जाता था तथा बिल्कुल स्वतंत्र रूप से अपना शिक्षा और वैज्ञानिक अनुसंधान का कार्य करता था। राजाओं के बीच होनेवाली आपसी लड़ाइयों में भी इनके आश्रमों को निशाना न बनाने का कठोर नियम आर्य संस्कृति में प्रचलित था। इस तरह यह सुनिश्चित किया जाता था कि शासकों की निजी या सांगठनिक विचारधारा का प्रभाव शिक्षा पद्दति पर न पड़े।

दूसरी बात। एक गुरुकुल में सारे विद्यार्थी एक बराबर होते थे। राजकुल के बच्चों को भी आश्रम के दैनिक कार्यों में वही परिश्रम करना पड़ता था जो सामान्य वर्ग के बच्चों को। पौराणिक कथाओं में स्पष्ट जिक्र आता है कि कृष्ण और श्रीदामा दोनों एक साथ वन में लकड़ी लाने जाया करते थे। जबकि कृष्ण राजकुल के एवं श्रीदामा अत्यंत निर्धन वर्ग से थे।

गुरुकुलों में कुछ खास चीजों पर बहुत जोर दिया जाता था


पहली चीज़ थी निडरता। वेदों में वर्णित पृथ्वी सूक्त कहता है- जैसे आकाश और पृथ्वी किसी से नहीं डरते, वैसे हम भी किसी से नहीं डरेंगे। ऐतिहासिक वृत्तान्तों में आता है, जब दुनिया का विजेता कहलानेवाला सिकंदर भारतीय ऋषियों और दार्शनिकों से मिला, तो उनकी निर्भयता और ज्ञान को देखकर दंग रह गया! यह वह दौर था जब तक्षशिला के गुरुकुल में आचार्य चाणक्य जैसे शिक्षक हुआ करते थे। उनके द्वारा दी गयी शिक्षाओं का प्रभाव ही था कि वहां के छात्रों ने चंद्रगुप्त मौर्य के नेतृत्व में सिकंदर की फौज को इतना त्रस्त किया कि वे पंजाब से आगे बढ़ ही नही सके।

गुरुकुलों की शिक्षा व्यवस्था में संवेदनशीलता का गुण छात्रों में कूट कूटकर भरा जाता था। समाज के प्रति संवेदना।प्रकृति का संरक्षण। निर्धनों और लाचारों पर दया। धर्म का आदर। राज्य के नियमों का पालन। यह सभी गुण इसी में समाहित हो जाते थे। इस तरह ये शिक्षा व्यवस्था राज्य के लिए हर तरह से उपयोगी नागरिकों का निर्माण करती थी।

एक और चीज़ अनिवार्य थी। छात्रों को जबरन कोई चीज़ पढ़ाने, रटाने का कड़ा निषेध था। शिक्षकों के लिए जरूरी था कि वे सर्वप्रथम विषय में छात्रों की रुचि को विकसित करें। उनमें प्रश्न पूछने की जिज्ञासा का विकास करें। इसके बाद ही कोई विषय पढ़ाया जाता था। अथर्ववेद में इसे रमण पद्दति कहा गया है। इसे रमण प्रणाली इसलिए कहा जाता था क्योंकि इसमें शिक्षकों एवं छात्रों, दोनों को ही आनंद आता था। यह प्रणाली छात्रों में वैज्ञानिक एवं तर्क संगत सोच का विकास करती थी। इसके साथ ही श्रद्धा एवं विश्वास पर आधारित एक मजबूत गुरु- शिष्य परंपरा को भी बनाये रखती थी।

इस अनूठी शिक्षण पद्दति के बारे में अथर्ववेद कहता है- " पुनरेहि वचस्पते देवेन मनसा सह।
वर्सोस्पते नि रमय मय्येवस्तु मयिम श्रुतम।।

आइये, इसका मतलब समझें। यह मंत्र शिक्षक और छात्र की एक दूसरे के प्रति भावनाओं को दर्शाता है कि वे एक दूसरे से क्या चाहते हैं। यहां विद्यार्थी कहता है कि अध्यापक को कुछ ऐसा करना चाहिए जिससे विद्यार्थियों को गुरुकुल आने में और यहां रहकर पढ़ने में आनंद का अनुभव हो! उसे गुरु के मुख से रोचक तरीके से विद्या का ज्ञान कराया जाए जिससे गुरु का पूरा ज्ञान शिष्य में समाहित हो सके। गुरुकुल की सारी गतिविधियां छात्रों को  रमण करानेवाली अर्थात आनंदित करनेवाली तथा साथ ही ज्ञान विज्ञान से परिचित करानेवाली हों।

मित्रों, इस शिक्षा प्रणाली के लाभ बहुत अधिक थे एवं हानियाँ नगण्य थीं। सातवीं सदी तक भारत में ऐसे गुरुकुल विद्यमान थे। फिर विदेशी आक्रमणों का सिलसिला शुरू हुआ और ये शिक्षा संस्थान उनके लिए आकर्षक लक्ष्य बनते गए। नालंदा, विक्रमशिला, काशी, मथुरा और प्रयाग जैसे केंद्र नष्ट कर दिए गए जहां ये केंद्र अच्छी खासी संस्था में थे।

मित्रों, मैं एक बात लिखना तो भूल ही गया! रमण शिक्षा प्रणाली में एक चीज़ का सबसे ज्यादा महत्व था। वह था- शिक्षक का व्यक्तित्व। शिक्षकों का व्यक्तित्व आदर्श हो, उनको देखने मात्र से ही लगे कि वे अपने विषय के जानकार हैं, वे अपने विषय को कई अलग अलग शैलियों में समझा सकें, ऐसे मानदंड उनके लिए निर्धारित थे।

चलिए, यहां पर एक सवाल लेते हैं- छात्रों को तो शिक्षक से केवल सिलेबस में वर्णित विषयों का ज्ञान लेना है, उसे शिक्षक के व्यक्तित्व से क्या लेना देना? अकबर महान के बारे में बताना हो या पाइथागोरस प्रमेय को समझाना हो, शिक्षक तो उन्ही तथ्यों को बताएंगे जो सिलेबस में होंगे! फिर छात्रों को इस बात से क्या मतलब कि उनकी वेश भूषा एवं सामाजिक व्यवहार कैसे हैं?

एक बार एक प्रयोग किया गया।किसी यूनिवर्सिटी में। एक अभिनेता को बुलाया गया।एक वैज्ञानिक को भी बुलाया गया। काम क्या था? दोनों को ही छात्रों के सामने एक लेक्चर देना था- विज्ञान के ऊपर। कक्षा में क्या बताना है, इसकी स्क्रिप्ट पहले से ही तय थी! दोनों को ही कक्षाओं में भेजा गया। छात्रों के आगे दोनों का परिचय विषय के विशेषज्ञ के रूप में दिया गया।

यहां एक चीज़ को जान लेते हैं। अभिनेता कैसा दिखता था? बिल्कुल हीरो की तरह! वैज्ञानिक कैसा दिखता था? बिल्कुल कॉलेज के प्रोफेसर की तरह! अगर आपने Three Idiots फिल्म देखी है तो समझना और भी आसान है। अभिनेता का व्यक्तित्व आमिर खान की तरह और वैज्ञानिक का व्यक्तित्व बोमन ईरानी या प्रोफेसर वायरस की तरह मान लीजिए!

चलिए, एक चीज़ को मान लेते हैं। अभिनेता सेक्शन A में गया और वैज्ञानिक सेक्शन B में।

लेक्चर शुरू हुए!फिर खत्म भी हुए! सेक्शन B के छात्रों को पूरा topic समझ में आया, जिसमें वैज्ञानिक गया था।विद्यार्थियों ने शिक्षक को बहुत जानकार और अच्छा बताया!

और सेक्शन A?उसमें अभिनेता गया था। उसके विद्यार्थियों का डब्बा ही गुल हो गया! छात्रों ने उसे ज्ञानहीन और बेकार शिक्षक बताया।

अब यहां एक बहुत बड़ा सवाल आ गया। अभिनेता और वैज्ञानिक, दोनों ने तो एक ही विषय वस्तु को पढ़ाया था। न एक शब्द ज्यादा, न एक शब्द कम। फिर छात्रों की समझ में फर्क कैसे आ गया? वैज्ञानिक वाले सेक्शन B के छात्र तो पढ़कर तीस मार खां बन गए, वहीं  अभिनेता वाले सेक्शन A के छात्र लल्लू ही बने रह गए!


अब आगे की बात। प्रयोगकर्ताओं ने इस बार सबकुछ opposite कर दिया। मतलब? पहले का उल्टा। इस बार अभिनेता को प्रोफेसर की वेशभूषा में लाया गया और वैज्ञानिक महोदय को अभिनेता जैसा गेटअप दिया गया। दोनों ने एक दूसरे का पूरा style अपना लिया।
इस बार अभिनेता ने प्रोफेसर का रोल करते हुए उसी विषय वस्तु को सेक्शन B में पढ़ाया। विद्यार्थियों को बहुत अच्छा लगा। समझ में सब आया।वहीं वैज्ञानिक महोदय सेक्शन B में जाकर flop हो गए।


दोस्तों, ये प्रयोग हमें क्या सिखाता है? यह सिखाता है कि शिक्षकों के व्यक्तित्व और छात्रों की learning ability के बीच  बहुत गहरा संबंध है।
यह खुशी की बात है कि दुनिया के अधिकांश देशों ने काफी पहले ही इस अवधारणा को अपनी शिक्षा पद्दति में शामिल कर लिया। यूरोप और ब्राज़ील की मिशनरी शिक्षा प्रणाली, जापान, कोरिया की बौद्ध और ताओ शिक्षा पद्दति, मिश्र, ईरान की इस्लामिक शिक्षा प्रणाली, इन सबके केंद्र में शिक्षक के व्यक्तित्व का सर्वाधिक महत्व है।
यह दुख की बात है कि अपना देश भारत अबतक यही नहीं सोच पाया है कि हमारी शिक्षा प्रणाली कैसी हो! हम अभी तक लार्ड मैकाले की दी हुई उसी शिक्षा प्रणाली पर चल रहे हैं जो भारतीयों को वैचारिक रूप से  गुलाम, शंकालु और दरिद्र रखने के लिए चलाई गई थी।

मित्रों,स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने कहा था- "वेदों की ओर लौटो"। ये बात हमारी शिक्षा प्रणाली पर अक्षरशः लागू होती है
 । आशा है इसमें अब ज्यादा समय नहीं लगेगा।

दोस्तों, आज इतना ही।फिर जल्दी ही मिलेंगे। आपके प्रेम और स्नेह के लिए हार्दिक धन्यवाद।

Comments

Popular posts from this blog

त्रिजटा: राक्षसी से देवी तक Trijata: From demon to Goddess

दोस्तों, आज हम बात करेंगे त्रिजटा के बारे में। रामायण का यह एक ऐसा पात्र है जिसकी चर्चा बहुत कम होती है।

त्रिजटा को सीताजी ने बड़े प्रेम से मां कहा था। यह सौभाग्य और किसी को कभी नहीं मिला! सीताजी ने त्रिजटा से न केवल अपनी व्यथा सुनाई, बल्कि चिता जलाने के लिए मदद भी मांगी!त्रिजटा ने समझाया और मनाया।ठीक उसी तरह जैसे एक मां अपनी बेटी को डांटकर प्रेम से समझाती है।ये अवसर भी किसी और को नहीं मिला!

दोस्तों, श्रीराम को अवतार और सीताजी को उनकी शक्ति बताया गया है। परमशक्ति भी किसी से सहायता मांग बैठे, यह प्रसंग आपको कहीं नहीं मिलेगा!

ऐसे वर्णन मिलते हैं कि त्रिजटा एक राक्षसी थी! रावण की सेविका थी! लेकिन बाद में उसका एक आदर्श स्वरूप देखने को मिलता है!

दोस्तों, आज के इस लेख में हम उन घटनाओं एवं परिस्थितियों को देखेंगे जिन्होंने एक साधारण सेविका को रामकथा में एक बहुत ऊंचे और श्रद्धेय स्थान की अधिकारिणी बनाया।

आईए, शुरू करते हैं।

त्रिजटा के पूर्वज शुरू से ही लंका राज्य के सेवक रहे थे। त्रिजटा ने भी कुलपरंपरा के अनुसार रावण की सेवा की। वृद्धा वस्था आने पर उसे एक आरामदायक और सम्मानित पद दिया गया। वह …

जटायु: एक अप्रतिम नायक Jatayu: An Unmatched Hero

दोस्तों, आज हम श्रीरामचरितमानस पर अपनी चर्चा को आगे बढ़ाएंगे।
कहते हैं, रामकथा में मानव की सारी समस्याओं के समाधान छिपे हैं। महात्मा गांधी सहित अनेक भारतीय और विदेशी महापुरुषों, विद्वानों तथा विचारकों ने रामराज्य की अवधारणा को प्रशासन का सर्वोत्तम रूप माना है जो रामकथा में वर्णित सिद्धान्तों पर आधारित है।
रामकथा में एक महत्वपूर्ण पात्र है जटायु। वृद्ध लेकिन बलशाली। पद से राजा लेकिन मन से संन्यासी! अधर्म का विरोध करते हुए अपने प्राण देनेवाला कर्मयोगी!


जटायु का जन्म एक विख्यात वंश में हुआ था। उनके पिता अरुण भगवान सूर्य के सारथी थे। शिक्षा पूरी होने के बाद उन्हें पंचवटी एवं नासिक क्षेत्र में निवास करने वाली एक जनजाति का अधिपति बनाया गया जिसका प्रतीक चिन्ह गिद्ध था। इस कारण से उन्हें गिद्धराज जटायु भी कहा जाता है।

दोस्तों, यहाँ एक सवाल लेते हैं। फिल्मों और धारावाहिकों में तो जटायु को पक्षी दिखाया गया है!उन्हें गिद्ध बताया गया है। तो क्या जटायु एक पक्षी थे?

नहीं दोस्तों, बिल्कुल नहीं। यह एक भ्रम मात्र है। वास्तव में जटायु एक जनजातीय राजा थे। उनका प्रतीक चिन्ह गिद्ध था। जिस तरह हम ऑस्ट्रेलि…

भगीरथ : भारत बदलने वाले नायक Bhagirath: The legend who changed India

दोस्तों, आज हम भगीरथ के बारे में बात करेंगे। मान्यता है कि भगीरथ ही गंगा नदी को इस भारतभूमि पर लेकर आये थे। इस अप्रतिम कार्य को करने के कारण वह भारतीय संस्कृति के सबसे बड़े नायकों में अपना स्थान रखते हैं।

आइये, आज इस लेख में हम संक्षिप्त रूप में भगीरथ के प्रयासों, कार्यों एवं उन घटनाओं की चर्चा करेंगे जिनके चलते गंगा नदी का इस भारतभूमि पर अवतरण हुआ। इस पौराणिक कथा में छिपे उन भौगोलिक और वैज्ञानिक तथ्यों की चर्चा भी हम करेंगे जो धार्मिक आस्था के पीछे छिपे होने के कारण अक्सर हमें नजर नहीं आते।

चलिए, शुरू करते हैं।
भगीरथ कोई आम इंसान नहीं थे। वह राजा थे।परम प्रतापी राजा दिलीप के पुत्र थे। भारत के सर्वाधिक शक्तिशाली राज्यों में से एक अयोध्या के सम्राट थे।
लेकिन एक बात उन्हें हमेशा दुखी करती रहती थी। दरअसल, कई पीढ़ी पहले राजा सगर नाम के एक पूर्वज थे। उनके सगर नाम रखे जाने के पीछे एक कारण था। सगर का अर्थ होता है विष से भरा व्यक्ति। जब वे अपनी माता के गर्भ में थे तभी उन्हें विष देकर मारने का प्रयास हुआ था। उस समय महर्षि च्यवन ने सही चिकित्सा करके उनकी माता की रक्षा की थी। आगे जाकर जब सगर जन्म…