Skip to main content

नहुष: एक पौराणिक कहानी Nahush: A story from Puranas



मित्रों, विश्वास है कि ये वेबसाइट आपको कुछ अच्छे विचारों से अवगत कराने में कारगर हो रही है! इसके पीछे आपलोगों का ही प्रेम और स्नेह है।

आज हम एक पौराणिक कहानी लेंगे और इसका ऐतिहासिक, वैज्ञानिक और तार्किक विश्लेषण करेंगे। हम देखेंगे कि हिन्दू धर्मग्रंथों की ये कहानी केवल कपोल कल्पना नहीं है।आप धार्मिक आस्था को परे रखकर अगर इसका इतिहास और विज्ञान की कसौटी पर तार्किक विश्लेषण करें, तो यह कहानी अपने असली स्वरूप में सामने आती है!

आइये, शुरू करते हैं।

राजा नहुष का वर्णन महाभारत में आता है। वह बहुत शक्तिशाली और लोकप्रिय राजा थे। उनके राज्य की शासन व्यवस्था को आदर्श माना जाता था।धर्म की उच्चतम मर्यादाओं पर आधारित शासन चलानेवाले नहुष का देवता भी सम्मान करते थे।

अचानक देवलोक पर एक विपदा आ गई। असुरों ने आक्रमण करके देवताओं को परास्त कर दिया! देवराज इंद्र का आत्मविश्वास हिल गया। वे किसी अज्ञात स्थान पर जा छिपे! लेकिन बाकी देवगण डटे रहे। उन्होनें स्वर्ग वापस छीन लिया। असुरों को भगा दिया।

अब देवताओं ने इंद्र से वापस आने का अनुरोध किया। लेकिन इंद्र नहीं माने। मानते भी कैसे? आप खुद सोचिए! जो राजा मुसीबत आने पर अपनी प्रजा को छोड़कर भाग जाए, वो किस मुँह से राजगद्दी पर बैठना चाहेगा!!! इंद्र अज्ञातवास में ही रहे।

देवताओं ने भी इंद्र की ज्यादा चिरौरी नहीं की। वे इंद्र के पद पर किसी सुयोग्य विभूति की तलाश करने लगे।

इंद्र के पद हेतु देवताओं की तलाश नहुष पर आकर खत्म हुई। नहुष हर तरह से देवलोक का शासन संभालने के योग्य थे। देवताओं ने नहुष से इसका अनुरोध किया!

लेकिन मामला जटिल हो गया। नहुष देवलोक जाकर इन्द्रपद ग्रहण करने के इच्छुक नहीं थे। त्याग और सदाचार का जीवन जीनेवाले सम्राट नहुष देवलोक के भोग विलास भरे जीवन को स्वीकार नहीं करना चाहते थे।

देवताओं की दाल नहीं गली तो उन्होनें ऋषियों का सहारा लिया। सप्त ऋषियों के कहने पर नहुष ने देवलोक  के शासक का पद स्वीकार कर लिया।

अब तो गजब ही हो गया! नहुष ने देवलोक के नियम ही बदल डाले। इंद्र के समय में देवलोक में हर समय रंभा, मेनका, तिलोत्तमा, उर्वशी आदि अप्सराओं का गायन और नृत्य हुआ करता था। नहुष के जमाने में वेदमंत्रों की ध्वनि गूंजने लगी। ऋषियों ने स्वर्ग में डेरा जमाकर भजन -कीर्तन -हवन आदि शुरू कर दिए।

लेकिन नहुष जैसे महान व्यक्ति से भी उत्साह में एक गलती हो गयी। उन्होंने चाहा कि सभी लोग धर्म की एक ही परंपरा और पद्दति को मानें। सदा से ही स्वतंत्र और शक्तिशाली ऋषियों ने इसे नहुष की ज्यादती माना। जल्दी ही नहुष का विरोध शुरू हो गया।

दोस्तों, यहां थोड़ा रुकिए। विचार करिये। इतिहास में अनेक ऐसे शासक हुये हैं, जिन्होंने नहुष जैसा प्रयास किया। सम्राट अकबर ने दीन ए इलाही धर्म की पद्दति चलाई।सम्राट अशोक ने धम्म का प्रचार जनता में किया, अपने बच्चों महेंद्र और संघमित्रा को इस कार्य में लगाया।

लेकिन एक बात है। जिस शासक ने प्रजा की सहमति लेकर धार्मिक प्रयास किये, उसी को सफलता मिली। ऊपर के उदाहरणों को लें तो सम्राट अशोक सफल रहे। वहीं अकबर और नहुष को असफलता हाथ लगी!

आइये, अब कथा में आगे चलें।

नहुष एक जगह और फंसे। पहले वाले इंद्र की पत्नी शची को उन्होंने अपने दरबार में एक सम्मानित स्थान दिया था। शची से उनका आकर्षण बढ़ा और उन्होंने विवाह का प्रस्ताव दे डाला! इससे अधिकांश देवगण भी उनके खिलाफ हो गए।

यहां एक बात सोचने योग्य है। क्या नहुष ने गलत किया था? बिल्कुल नहीं। उन्होंने तो केवल विवाह का प्रस्ताव दिया था! प्राचीन राजवंशों के लिए यह कोई नया नहीं था। हमने इतिहास में ऐसे कई उदाहरण देखे हैं जब नए शासकों ने मारे जा चुके शासक की विधवा से विवाह किए थे। यहां इस मामले में भी पहले वाले इंद्र का कोई अता पता तो था नहीं।

लेकिन धरती के मनुष्यों पर शासन करनेवाले नहुष शायद भूल चुके थे कि देवताओं ने मजबूरी में उन्हें शासक बनाया था!ऋषियों से वैमनस्य और शची से विवाह का प्रस्ताव, इन दो बातों ने मिलकर उनके पतन की पृष्ठभूमि तैयार कर दी।

देवताओं ने पहले वाले इंद्र को फिर से खोज निकाला। शची ने उन्हें फिर से इन्द्रपद ग्रहण करने हेतु मना लिया।

कथा बताती है।पहले वाले इंद्र ने चतुराई दिखाई। नहुष को पद से च्युत करने की भूमिका बनाई ।इसके अनुसार शची ने विवाह के लिए शर्त रखी। सप्त ऋषियों द्वारा ढोई जानेवाली पालकी पर आने को कहा। नहुष ने सोचा कि वे ऋषियों को मना लेंगे!लेकिन सप्तऋषि भड़क उठे। महर्षि अगस्त्य ने नहुष को श्राप देकर, सर्प बनाकर जंगल में निष्कासित कर दिया। पहले वाले इंद्र फिर से स्वर्ग में आ गए। सब पहले जैसा हो गया!

लेकिन दोस्तों, जरा सोचिए। इस कथा में कुछ तथ्य छिपे हैं, जिन्हें जानना जरूरी है।

शची ने ऐसी शर्त क्यों रखी कि विवाह हेतु नहुष पालकी से आएं और उस पालकी को उस समय के सबसे महान सात ऋषि ढोकर लाएं? ये तो कहीं से भी सच नहीं लगता!

कथा के अनुसार, नहुष ने ऋषियों को अपनी पालकी ढोने हेतु विवश किया। जो ऋषि अपनी शक्ति से स्वर्ग को नष्ट करने एवं बनाने की शक्ति रखते थे, वो भला विवश कैसे हो गए! ये तो मानने की बात ही नहीं।

अब आखिरी तथ्य! धरती का सबसे लोकप्रिय और धर्मात्मा राजा अजगर कैसे बन गया? क्या आपको इस बात पर भरोसा होता है?

मित्रों, आइये हम इतिहास,मनोविज्ञान और राजनीति के सिद्धांतों से इन प्रश्नों के उत्तर प्राप्त करें। इनसे पता चलेगा कि ऊपर ऊपर से कपोल कल्पना लगने वाली इस कहानी में क्या तथ्य छिपे हैं।

दोस्तों, जब हमें बेमन से किसी चीज़ को मानना पड़ता है, तो हम क्या कहते हैं? हम कहते हैं कि फलानी चीज़ को ढो रहें हैं!! ऋषियों द्वारा पालकी ढोने का यही अर्थ है कि वो नहुष के धार्मिक विश्वासों को बेमन से मान रहे थे!

विवाह के लिए ऋषियों की पालकी पर जाने का अर्थ है, नहुष के द्वारा ऋषिवर्ग पर अपनी विजय का सार्वजनिक प्रदर्शन। यह अनुचित था।उन्हें ऐसा करने के लिए शची ने प्रेरित किया था। नहुष को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी।

नहुष को वन में निष्कासित किया गया जहां वे सर्प बन गए। इसका अर्थ ये है कि नहुष ने राज्य छोड़कर नागों की जनजाति का आश्रय लिया जो वनों में रहनेवाली जनजाति थी। यह स्वाभाविक भी था! नहुष ने शची के बहकावे में आकर ऋषियों पर अत्याचार करने की सोची। आगे उन्होंने इस भूल का पश्चाताप करना चाहा। और इसके लिए वन जाकर तपस्या करने का रास्ता चुना। वहां नागों ने उनकी सहायता की।

मित्रों, सच परेशान तो होता है पर पराजित नहीं। ऋषियों को सच जानने में देर नहीं लगी।चूंकि नहुष फिर से राजगद्दी पर बैठने के लिए तैयार नहीं थे, अतः शासन उनके पुत्र ययाति को सौंप दिया गया।वो बहुत योग्य निकले।


पुराणों में नहुष की कथा यहीं आकर विराम लेती है। लेकिन मित्रों, हम यहाँ से भी आगे जाएंगे।

प्रसिद्ध ग्रीक इतिहासकार हेरोडोटस ने प्राचीन मिस्र के राजा डायोनिसास का वर्णन लिखा था। डायोनिसास पूर्व देश से वहां आये थे। उन्होंने तत्कालीन मिस्र के अविकसित ग्रामीण लोगों को कृषि का ज्ञान दिया। नगर बनाने की शिक्षा दी। एक मजबूत शासन प्रणाली की स्थापना की।

मित्रों, अनेक सूत्रों के आधार पर कई लोग मानते हैं कि भारत के राजा नहुष को ही मिश्र देस में डायोनिसास के नाम से जाना गया।

तो देखा आपने! विश्व में सभ्यता जहां भी फली फूली, वहां भारत का संबंध जरूर रहा।

अब एक सवाल लेते है। आखिर इसका आज के युग में क्या महत्व है?
मित्रों, अगर इन प्राचीन लोककथाओं को आज की रोशनी में देखा जाए तो यह अनेक देशों से हमारे सांस्कृतिक संबंधों का आधार बन सकती हैं। नेपाल, ईरान,म्यांमार, इंडोनेशिया, थाईलैंड, कोरिया आदि अनेक देशों के साथ हमारे गहरे सांस्कृतिक संबंधों का कारण हमारी ऐतिहासिक लोककथायें ही हैं।

संक्षेप में एक उदाहरण सुनिए। दक्षिण कोरिया में एक लोककथा के अनुसार वहां की एक प्राचीन महारानी अयोध्या से आई थी। जब भारतीय शोधकर्ताओं को पता चला तो उन्होंने इसके प्रमाण यहां की लोककथाओं में ढूंढ निकाले। कोरिया की सरकार ने उस महारानी के सम्मान में अयोध्या में एक स्मारक बनवाया। अब हर साल वहां भारत और दक्षिण कोरिया के द्वारा एक संयुक्त सांस्कृतिक महोत्सव आयोजित होता है।इस तरह स्पष्ट है कि प्राचीन घटनाएं हमारे आज के संबंधों का भी आधार बन सकती हैं।

मित्रों,विश्वास है कि आपको यह लेख अच्छा लगा होगा। आपके प्रेम और स्नेह के लिए धन्यवाद!








Comments

Popular posts from this blog

त्रिजटा: राक्षसी से देवी तक Trijata: From demon to Goddess

दोस्तों, आज हम बात करेंगे त्रिजटा के बारे में। रामायण का यह एक ऐसा पात्र है जिसकी चर्चा बहुत कम होती है।

त्रिजटा को सीताजी ने बड़े प्रेम से मां कहा था। यह सौभाग्य और किसी को कभी नहीं मिला! सीताजी ने त्रिजटा से न केवल अपनी व्यथा सुनाई, बल्कि चिता जलाने के लिए मदद भी मांगी!त्रिजटा ने समझाया और मनाया।ठीक उसी तरह जैसे एक मां अपनी बेटी को डांटकर प्रेम से समझाती है।ये अवसर भी किसी और को नहीं मिला!

दोस्तों, श्रीराम को अवतार और सीताजी को उनकी शक्ति बताया गया है। परमशक्ति भी किसी से सहायता मांग बैठे, यह प्रसंग आपको कहीं नहीं मिलेगा!

ऐसे वर्णन मिलते हैं कि त्रिजटा एक राक्षसी थी! रावण की सेविका थी! लेकिन बाद में उसका एक आदर्श स्वरूप देखने को मिलता है!

दोस्तों, आज के इस लेख में हम उन घटनाओं एवं परिस्थितियों को देखेंगे जिन्होंने एक साधारण सेविका को रामकथा में एक बहुत ऊंचे और श्रद्धेय स्थान की अधिकारिणी बनाया।

आईए, शुरू करते हैं।

त्रिजटा के पूर्वज शुरू से ही लंका राज्य के सेवक रहे थे। त्रिजटा ने भी कुलपरंपरा के अनुसार रावण की सेवा की। वृद्धा वस्था आने पर उसे एक आरामदायक और सम्मानित पद दिया गया। वह …

जटायु: एक अप्रतिम नायक Jatayu: An Unmatched Hero

दोस्तों, आज हम श्रीरामचरितमानस पर अपनी चर्चा को आगे बढ़ाएंगे।
कहते हैं, रामकथा में मानव की सारी समस्याओं के समाधान छिपे हैं। महात्मा गांधी सहित अनेक भारतीय और विदेशी महापुरुषों, विद्वानों तथा विचारकों ने रामराज्य की अवधारणा को प्रशासन का सर्वोत्तम रूप माना है जो रामकथा में वर्णित सिद्धान्तों पर आधारित है।
रामकथा में एक महत्वपूर्ण पात्र है जटायु। वृद्ध लेकिन बलशाली। पद से राजा लेकिन मन से संन्यासी! अधर्म का विरोध करते हुए अपने प्राण देनेवाला कर्मयोगी!


जटायु का जन्म एक विख्यात वंश में हुआ था। उनके पिता अरुण भगवान सूर्य के सारथी थे। शिक्षा पूरी होने के बाद उन्हें पंचवटी एवं नासिक क्षेत्र में निवास करने वाली एक जनजाति का अधिपति बनाया गया जिसका प्रतीक चिन्ह गिद्ध था। इस कारण से उन्हें गिद्धराज जटायु भी कहा जाता है।

दोस्तों, यहाँ एक सवाल लेते हैं। फिल्मों और धारावाहिकों में तो जटायु को पक्षी दिखाया गया है!उन्हें गिद्ध बताया गया है। तो क्या जटायु एक पक्षी थे?

नहीं दोस्तों, बिल्कुल नहीं। यह एक भ्रम मात्र है। वास्तव में जटायु एक जनजातीय राजा थे। उनका प्रतीक चिन्ह गिद्ध था। जिस तरह हम ऑस्ट्रेलि…

भगीरथ : भारत बदलने वाले नायक Bhagirath: The legend who changed India

दोस्तों, आज हम भगीरथ के बारे में बात करेंगे। मान्यता है कि भगीरथ ही गंगा नदी को इस भारतभूमि पर लेकर आये थे। इस अप्रतिम कार्य को करने के कारण वह भारतीय संस्कृति के सबसे बड़े नायकों में अपना स्थान रखते हैं।

आइये, आज इस लेख में हम संक्षिप्त रूप में भगीरथ के प्रयासों, कार्यों एवं उन घटनाओं की चर्चा करेंगे जिनके चलते गंगा नदी का इस भारतभूमि पर अवतरण हुआ। इस पौराणिक कथा में छिपे उन भौगोलिक और वैज्ञानिक तथ्यों की चर्चा भी हम करेंगे जो धार्मिक आस्था के पीछे छिपे होने के कारण अक्सर हमें नजर नहीं आते।

चलिए, शुरू करते हैं।
भगीरथ कोई आम इंसान नहीं थे। वह राजा थे।परम प्रतापी राजा दिलीप के पुत्र थे। भारत के सर्वाधिक शक्तिशाली राज्यों में से एक अयोध्या के सम्राट थे।
लेकिन एक बात उन्हें हमेशा दुखी करती रहती थी। दरअसल, कई पीढ़ी पहले राजा सगर नाम के एक पूर्वज थे। उनके सगर नाम रखे जाने के पीछे एक कारण था। सगर का अर्थ होता है विष से भरा व्यक्ति। जब वे अपनी माता के गर्भ में थे तभी उन्हें विष देकर मारने का प्रयास हुआ था। उस समय महर्षि च्यवन ने सही चिकित्सा करके उनकी माता की रक्षा की थी। आगे जाकर जब सगर जन्म…