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निःस्वार्थ सेवा: शक्ति का स्त्रोत Selfless service : Source of Innerpower

मित्रों, आज हम श्रीरामचरितमानस का एक सूत्र लेंगे और उसमें निहित योगविज्ञान के सिद्धांत को समझेंगे। आज इस सूत्र के माध्यम से हम इस बात को समझेंगे कि हर धर्म में असहायों एवं दुखियों की मदद करने की बात क्यों कही गयी है।योगविज्ञान के इस सिद्धांत से हम इस बात को भी समझेंगे की कैसे किसी असहाय को की गई मदद अन्ततः कई गुना बनकर हमें ही मिल जाती है!


आइये, शुरू करते हैं।

हम बचपन से ही सीखते आये हैं। दुखियों एवं असहायों की मदद करो। दुनिया के सारे धर्मों में ये बात मिलती है।

आज हम एक सवाल लेते हैं! आखिर यह सीख क्यों दी जाती है? इसका आधार क्या है? किसी दुखी एवं लाचार की मदद हमें क्यों करनी चाहिए?

चलिए, उत्तर ढूंढते हैं।

श्रीरामचरितमानस का एक सूत्र है- 
                 " गिरा अरथ जल बीचि सम
                    कहियत भिन्न न भिन्न
                    बंदउ सीता राम पद
                    जिन्हहिं परम प्रिय खिन्न।।"
" इसका अर्थ क्या है?"
" जिस तरह वाणी और उसका अर्थ एक ही लगता है, जल और उसकी तरंगे एक ही दिखती हैं। उसी तरह हमें सीता राम को एक ही मानना चाहिए जिन्हें सबसे प्रिय खिन्न अर्थात असहाय और लाचार लोग हैं"।


आइये, हम इस सूत्र को समझने की कोशिश करते हैं। इसे decode करते हैं। यह बिल्कुल सरल है।


"पहले गिरा अर्थात वाणी और अर्थ की बात। हम मुँह से जो कहते हैं, उसका कोई अर्थ जरूर पैदा होता है। हमारी आवाज़ वायुमंडल में कंपन पैदा करती है। यह कंपन सुनने वाले के कान के पर्दे को प्रभावित करता है। फिर auditory nerve के द्वारा यह संकेत दिमाग को पहुँचते हैं।दिमाग इनका विश्लेषण करता है। तब जाकर हमें बोली गयी बात का अर्थ समझ में आता है। इस तरह देखा जाए तो वाणी एक कार्य है और अर्थ समझना उसका परिणाम! लेकिन यह दोनों एक सेकण्ड के सौवें हिस्से से भी कम समय में घट जाते हैं। इस तरह देखने में एक ही लगते हैं।"


अब जल और उसकी वीचियों अर्थात तरंगों की बात। समुद्र में, नदी में तरंगे waves दिखती हैं। लेकिन काफी दूर से देखें तो एक लगेंगे।


श्रीराम परमब्रह्म और सीताजी उनकी शक्ति हैं। दूर से देखने पर ये अलग हैं। जिस तरह आदमी के पैरों में चलने की शक्ति और आंखों में देखने की शक्ति निहित है, उसी तरह परमब्रह्म में भी उनकी शक्ति निहित है। इसी शक्ति से सृष्टि के कार्य होते हैं।

अब इस सूत्र का अंतिम भाग। यह बताता है कि श्रीरामचन्द्रजी को खिन्न लोग प्रिय हैं। खिन्न मतलब ? मजबूर, लाचार, दुखी।



आइये, और सरलता से समझे!

यह सूत्र क्या कहना चाहता है?

यही कि संसार मे जो भी कार्य हो रहे हैं। चाहे प्रकृति द्वारा अथवा मनुष्य द्वारा। वो किसी शक्ति से ही हो रहे हैं। और यह शक्ति अलग दिखाई देते हुए भी परमब्रह्म में ही निहित है। खिन्न लोगों की सहायता करके व्यक्ति इस परमशक्ति की कृपा प्राप्त कर सकता है।

अब यहां रुकते हैं। अब हम चलेंगे योगविज्ञान में। यह समझेंगे कि दुखियों की सहायता से परमशक्ति की कृपा कैसे मिलती है! खुद हमें कैसे इसका लाभ मिलेगा।


देखिए, बहुत आसान है। यौगिक सिद्धांतों के अनुसार जब भी आप कोई अच्छा काम करते हैं, जैसे किसी लाचार अपाहिज की सहायता करते हैं। तो आपको एक आत्मिक आनंद मिलता है। ये आनंद आपके नकारात्मक कर्मो के एक अंश को नष्ट कर देता है! आपमें अभ्यास की प्रवृत्ति जगती है कि मौका मिले तो ऐसा अच्छा काम फिर करूँगा! ये प्रवृति व्यक्ति में ईश्वरप्रणिधान को बढ़ाती है! इसमें दो बातें होती हैं। आदमी का खुद में विश्वास बहुत बढ़ जाता है।इसके साथ ही ईश्वर में भी विश्वास बढ़ता जाता है! खुद में आत्मविश्वास और ईश्वर में विश्वास से मन पर नियंत्रण बढ़ता है। इस तरह व्यक्ति कर्मयोग के पथ पर बढ़ने लगता है। इसके लाभ भी ज्ञानयोग और भक्तियोग के समान ही हैं।

यहां एक दिलचस्प बात है। कर्मयोगियों में दुनिया को हिला देनेवाला आत्मविश्वास विकसित हो जाता है! वो हमेशा भीड़ के आगे चलते हैं।समाज उनके पीछे चलता है।जबकि भक्तियोगियों में सर्वोच्च विनम्रता देखने को मिलती है। वो नींव के पत्थर की तरह कार्य करते हैं।

स्वामी विवेकानंद की एक उक्ति है। अगर कोई दुखी आपसे सहायता मांगने आए और आप उसमें सक्षम हों। तो समझिये कि ईश्वर ने उसे आपके लाभ के लिए भेजा है। क्योंकि उसकी मदद करके आप अपनी शक्ति के एक अंश को जागृत कर पाते हैं। शक्ति का यह अंश आपको कर्मयोग की तरफ उन्मुख करता है!

ईसाई धर्म भी इस मान्यता में विश्वास करता है कि ईश्वर का सामीप्य प्राप्त करने का उपाय मानवसेवा ही है।


अब वापस आते हैं श्रीरामचरितमानस के सूत्र पर।

दोस्तों, इस अलौकिक ग्रंथ का एक रहस्य जानने योग्य है! इसमें किसी विशिष्ट विषय particular subject से जुड़े गए सारे सूत्र एक ही जगह पर नहीं मिलते! वो आपको अलग अलग बिखरे मिलेंगे। और आपको उन्हें जोड़ना होगा। तभी आप इन्हें decode कर पाएंगे!

हमने सबसे शुरू में जो आधारभूत सूत्र लिया था, वह बालकांड से है।  इसका पूरक सूत्र उत्तरकांड में है- "परहित सरिस धर्म नहीं भाई, परपीड़ा सम नहीं अधमाई।।" इसमें कहा गया है कि सेवा के समान कोई धर्म नहीं।

दोस्तों, उम्मीद है, यह लेख आपको अच्छा लगा होगा! इस तरह के सूत्र हम आगे भी लेंगे। आज यहीं तक। आपने अपना समय दिया! इसके लिए बहुत धन्यवाद!







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