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मन की बात: योगविज्ञान के साथ Chittabhumi: Five states of mind

दोस्तों, आज हम एक महत्वपूर्ण topic पर बात करेंगे। योग पर अपनी चर्चा को आगे बढ़ाएंगे। सरल और रोचक तरीके से।

आज बात करते हैं चित्त भूमियों के बारे में। इसका जिक्र महर्षि पतंजलि ने अपने योगसूत्र ग्रंथ में किया है। उनका यह ग्रंथ पूरे योगविज्ञान का आधार है।
पतंजलि की एक बहुत बड़ी खासियत है। हर सिद्धान्त को बड़े संक्षेप में कहते हैं।
चित्त भूमियों के बारे में वे कहते हैं-" क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त, एकाग्र और निरुद्ध, चित्त की ये पांच भूमियां हैं।"

आइये, उनकी बात को समझने की कोशिश करते हैं। चित्त क्या है? मोटे तौर पर कहा जाए तो मन ही हमारा चित्त है। प्यार, नफरत, क्रोध, ममता आदि जितनी भी भावनाएं हैं सब चित्त अर्थात मन में महसूस होती हैं।

मन पांच अवस्थाओं में रह सकता है। जिस अवस्था में मन रहेगा, उस व्यक्ति की मानसिक ऊर्जा और क्षमता भी उसी तरह की हो जाएगी।

आइये और सरल ढंग से समझें।
"मन की पांच अलग अलग अवस्थायें क्यों हैं। ये एक अवस्था में हमेशा क्यों नहीं रहता"
"ऐसा इसलिए कि आप जीवन की तमाम भावनाओं का अनुभव कर सकें। जब जैसी परिस्थिति आती है, मन उस अवस्था में चला जाता है।"
"मन की क्षिप्त अवस्था क्या है?"
"मन में जब अनेक विचार एक साथ चलें तो वह क्षिप्त अवस्था है। सौ में से 99 लोगों का मन इसी अवस्था में अधिकांश समय तक रहता है।
इसको समझने के लिए एक काम करिये। पांच मिनट तक अपने मन में कोई विचार मत आने दें।….............क्या? मुश्किल है! बिल्कुल सही अनुभव किया आपने। जैसे ही कुछ न सोचने का निश्चय करते हैं, मन में विचारों की बाढ़ आ जाती है।
योग विज्ञान के अनुसार हर विचार के पीछे मन की शक्ति होती है। मानव के मन में हर रोज हजारों विचार ऐसे ही आते हैं और चले जाते हैं। इसके उसके मन की शक्ति व्यर्थ चली जाती है।यही अवस्था मन की क्षिप्त अवस्था है।

अब आगे। मन की दूसरी अवस्था है -मूढ़। मतलब? एक जड़ता की स्थिति। जब हम सोते हैं, नशे में होते हैं या घनघोर आलसी बनकर बिस्तर पर पड़े होते हैं तो मन मूढ़ अवस्था में होता है। इस हालत में मन कुछ भी अच्छा या सार्थक नहीं सोच सकता।

तीसरी अवस्था है विक्षिप्त। मतलब? मन किसी चीज़ पर केंद्रित तो है पर बीच बीच में दूसरे विचार भी आते हैं। जैसे? जब हम गाड़ी चलाते हैं, क्लासरूम में बैठकर पढ़ते हैं, कोई रोचक फ़िल्म देखते हैं। इन स्थितियों में मन विक्षिप्त अवस्था में होता है।

चौथी अवस्था है- एकाग्र। मतलब? मन पूरी तरह एक विचार, एक चीज़ पर ही केंद्रित रहे। जैसे? अपने प्रयोगों में मग्न कोई वैज्ञानिक, पढ़ाई में डूबा कोई छात्र, लड़ाकू विमान उड़ाता पायलट इत्यादि। मन की यह अवस्था सर्वोत्तम कार्य करके दिखाती है। आज तक विश्व के जितने भी बड़े कार्य हुए हैं, उनकी कल्पना किसी न किसी एकाग्र मन ने ही की है।

पांचवी अवस्था है निरुद्ध। यह अवस्था मन की सर्वोच्च अवस्था है जिसमें मन अपनी शत प्रतिशत क्षमता से कार्य करता है। मन की ये अवस्था प्राप्त कर पाना गिने चुने लोगों के लिए ही संभव है।

दोस्तों, अब एक दिलचस्प बात करते हैं। वो क्या? एक आम आदमी अपनी मानसिक क्षमता का दस प्रतिशत से ज्यादा प्रयोग नहीं कर पाता!
" क्यों"
" क्योंकि एक आम आदमी का मन अधिकांश समय क्षिप्त और मूढ़ अवस्था में होता है। उसके मन में विचारों की भीड़ लगी रहती है"
मित्रों, योगविज्ञान के अनुसार विक्षिप्त, एकाग्र और निरुद्ध इन तीन अवस्थाओं में ही आप अपनी मानसिक क्षमता का बेहतर इस्तेमाल कर सकते हैं।
" तो क्या करना होगा?"
"मन को क्षिप्त एवं मूढ़ अवस्था से विक्षिप्त एवं एकाग्र अवस्था तक लाना होगा"
" वो कैसे?"
" योगविज्ञान में बताई गई तकनीकों से"
" उदाहरण?"
" सुख के प्रति मैत्री, दुख के प्रति करुणा, अच्छी बातों के प्रति उत्साह, बुरी चीजों के प्रति उदासीनता की भावना रखने से मन की ऊर्जा बढ़ती है। इसके अतिरिक्त शास्त्रीय संगीत, प्रातः काल भ्रमण, धार्मिक स्थलों जैसे मंदिर, गुरूद्वारों में जाकर निस्वार्थ सेवा करना, प्राणायाम, सूर्यनमस्कार, वृद्धजनों एवं विकलांगों की सेवा, आत्मीय जनों की समीपता आदि कुछ ऐसी चीज़ें हैं जो क्षिप्त और मूढ़ अवस्था में रहने वाले मन को खींचकर एकाग्र अवस्था में ले आती हैं। अगर मन अधिकांश समय तक एकाग्र अवस्था में रहना सीख जाए, तो समझिए, काम हो गया। अब उसका जीवन बदलकर ही रहेगा।"
" क्या कोई और भी उपाय है?"
" हां कुछ और तरीके भी हैं। चाय, कॉफी, कुछ दवाइयां, किसी का जोशीला भाषण, यू ट्यूब का कोई प्रेरणादायक वीडियो,ऊर्जावान व्यक्ति की संगति इत्यादि । इनसे आप अपने मन की अवस्था तुरंत बदल सकते हैं। उदाहरण के लिए कड़क चाय पीने से नींद की मूढ़ अवस्था हट जाती है और मन विक्षिप्त अवस्था में आ जाता है। amfitemyne औषधि का भी यही प्रभाव है।लेकिन ध्यान दीजिए, ये उपाय केवल temporary होंगे। इनसे मन पर कोई स्थायी लाभ नहीं होगा।"
" ये सब जानने का क्या लाभ होगा?"
"हम अपनी मानसिक ऊर्जा बढ़ा सकते हैं। एक एकाग्र व्यक्ति अपने लिए और पूरे समाज के लिए बहुत उपयोगी कार्य करता है।एक एकाग्र शिक्षक अपने विद्यार्थियों को सबसे बेहतर ढंग से पढ़ा सकता है।एकाग्र छात्र किसी भी ज्ञान को जल्दी और बेहतर ढंग से सीखते हैं। यही वजह है कि हमारी पूरी शिक्षा प्रणाली में एकाग्रता पर बहुत ज्यादा जोर दिया जाता है। एक अच्छी शिक्षा प्रणाली से निकले लोगों में एकाग्रता की ये प्रवृत्ति आगे भी बनी रहती है।"
" योग विज्ञान में मन की ऊर्जा बढ़ाने के और क्या तरीके हैं?"
" अनेक तरीके हैं। त्राटक है। नादयोग है।नेति भी उपयोगी है।और भी हैं"
"क्या इन्हें कोई भी कर सकता है?"
"हां। आप किसी अच्छे योग विशेषज्ञ से इन्हें सीख सकते हैं। कुछ हजार रुपये खर्च तो होंगे लेकिन इनके लाभ अमूल्य हैं।"

दोस्तों,यहां एक बात ध्यान देने की है।विशेषज्ञ की जरूरत वहीं है जहां आप किसी उच्च तकनीक जैसे त्राटक आदि को सीखना चाहें। इस लेख में ऊपर जिन उपायों की चर्चा की गई है, उनमें किसी की जरूरत नहीं।आप खुद ही कर सकते हैं।

दोस्तों, आज हमने चित्तभूमियों या मन की अवस्थाओं के बारे में जाना। हमने इसके व्यवहारिक पक्ष को भी देखा। आगे भी हम पतंजलि के सिद्धांतों पर चर्चा जारी रखेंगे। आपकी अपनी वेबसाइट ashtyaam. com की तरफ से धन्यवाद और शुभकामनाएं।



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