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श्रीकृष्ण: एक युगान्तकारी व्यक्तित्व Krishna : ek yugantkari vyaktitva




आज बात करते हैं श्रीकृष्ण के बारे में।
इनके बारे में लिखना बहुत मुश्किल है। क्यों? ये अनगिनत घटनाओं के नायक हैं। सारी घटनाएं एक दूसरे से जुड़ी हैं।प्रसिद्ध भी हैं। इनपर कुछ भी लिखना हो तो घटनाएं जुड़ती चली जाएंगी।एक ग्रंथ बन जायेगा।इस तरह देखा जाए तो संक्षेप में कुछ लिख पाना अत्यंत मुश्किल है।
लिखने की बात रहने दें।आज कुछ चर्चा करते हैं। इसी बहाने श्रीकृष्ण का स्मरण भी होगा! यह एक सर्वमान्य सिद्धांत है कि महापुरुषों का स्मरण हमारी सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाता है।हमें शक्ति देता है।

पहले कुछ विज्ञान की बात करते हैं। श्री रंगनाथ राव भारत के शीर्ष archaeologist अर्थात पुरातत्व वैज्ञानिकों में से एक हैं।वे भारतीय समुद्र अध्ययन संस्थान से जुड़े थे। ये क्या है? ये समुद्र के ऊपर शोध करता है।
डॉ रघुनाथ ने एक बहुत बड़ी खोज की।द्वारिका की खोज। समुद्र में डूबे इस नगर के ऊपर उन्होंने एक किताब लिखी। The Lost City of Dwarika। इसमें उन्होंने बताया कि हजारों साल पहले द्वारिका नाम का एक अत्यंत उन्नत नगर था।इसकी रचना वैज्ञानिक ढंग से की गयी थी। आगे जाकर समुद्र का जलस्तर बढ़ा और यह नगर समुद्र में डूब गया।
इस शोध से इतिहास की पुष्टि होती है।यह वही द्वारिका थी जो श्रीकृष्ण के द्वारा बसाई गयी थी। द्वापर युग में ज्ञान विज्ञान का केंद्र थी।जब कृष्ण ने अपनी लीला समेटी तो यह केंद्र समुद्र में डूब गया। कलियुग या dark age की शुरुआत हुई।

कृष्ण में अद्भुत संगठन कौशल था। बालक अवस्था में ही उन्होंने ग्वालबालों अर्थात गाय चराने वालों का शक्तिशाली संगठन बनाया। यह संगठन पूरे ब्रज क्षेत्र में प्रसिद्ध था। इस संगठन की मदद से उन्होंने अद्भुत काम किए। अत्याचारी शासक कंस के अनेक योद्धाओं को मार डाला।इस संगठन को ब्रज की गोपियों अर्थात महिलाओं का पूर्ण समर्थन था।

श्रीकृष्ण के संगठन ने अनेक धार्मिक सुधार भी किये। राजसत्ता के दबाव में होनेवाली इंद्र की पूजा बन्द कर दी। यह पूजा राजा को महिमामंडित करती थी। इसकी जगह पर गोवर्धन पर्वत एवं प्रकृति की पूजा शुरू की गई। कंस के कुकर्मों से त्रस्त तत्कालीन ब्राम्हण वर्ग भी श्रीकृष्ण के साथ खड़ा हो गया और गोवर्धन पूजा शुरू हो गयी।

जल्दी ही श्रीकृष्ण शासक वर्ग के निशाने पर आ गए। कृष्ण और कंस का टकराव शुरू हो गया।

कंस एक निरंकुश, क्रूर एवं अत्याचारी शासक था। वह मगध सम्राट जरासंध का दामाद और सबसे प्रमुख सहयोगी था। मगध सम्राट के सहयोग से वह अत्यंत शक्तिशाली था।

कंस की विचारधारा एवं दंडनीति बड़ी विचित्र थी। कंस का मानना था कि राज्य की सभी सुंदर और अच्छी चीजों पर राजा का हक होता है। कंस के कर्मचारी जहां भी कुछ अच्छा देखते, उठा लाते। प्रजा का धन, मवेशी, आभूषण आदि छीन लेते। स्त्रियों को भी इस नीति का शिकार बनाया जाता था। यही कारण है कि जब श्रीकृष्ण कंस की सत्ता के विरुद्ध खड़े हुए तो स्त्रियों ने उनके संघर्ष में बढ़ चढ़कर समर्थन दिया। जहां रूढ़िवादी तत्व आड़े आये, उन्होंने उनके खिलाफ जाकर कृष्ण का साथ दिया।

ऐसा देखा गया है कि जिस आंदोलन में महिलाओं की बड़ी भागीदारी हो, वह सफल हो जाता है। ऐसा क्यों? क्योंकि महिलाओं के पीछे पूरा समाज उस आंदोलन में आ जायेगा।

आइये, एक उदाहरण आधुनिक युग का लें। सन 1930 में महात्मा गांधी ने दांडी मार्च का आयोजन किया। क्यों किया ? क्योंकि अंग्रेज़ सरकार ने नमक पर टैक्स लगा दिया था। हकीकत ये थी कि सरकार किसी भी चीज़ पर कभी भी मनमाना टैक्स लगा देती थी। गांधीजी ने नमक को एक प्रतीक बनाया। योजना बनी की अहमदाबाद से 384 किमी दूर दांडी जाकर नमक कानून को तोड़ा जाए। 78 लोग गांधी के साथ चले।इस आंदोलन में एक अनूठी बात हुई। जिस गाँव मे जाते, वहां की महिलाएं इस पदयात्रा में कुछ दूर तक साथ हो जातीं। नमक किसी भी गृहणी की रसोई का सबसे आवश्यक तत्व है। गांधीजी ने इसको अपना तत्व बनाकर उन्हें भी सत्याग्रह से जोड़ दिया। ये यात्रा इसी वजह से भारत के स्वाधीनता आंदोलन का एक turning point अर्थात मील का पत्थर मानी जाती है।


ब्रज क्षेत्र में भी कुछ ऐसा ही हुआ।पहले युवावर्ग, फिर महिलाएं, इसके बाद ब्राम्हण और अंत में पूरा समाज कृष्ण के साथ आ गया। कंस के अधिकांश सैनिक भी आ मिले। कंस के साथ वही सेना रही जो मगध सम्राट की ओर से सहायता के लिए भेजी गई थी।

कृष्ण एक अप्रतिम रणनीतिज्ञ थे। वो जानते थे कि मगध सेना से लड़ने में जन धन की हानि होगी। अतः उन्होनें सार्वजनिक द्वंद युद्ध करके कंस का वध कर दिया। ये कैसे हुआ ? असल में यह एक प्राचीन परंपरा है। अगर दो सेनाओं के सेनापति चाहें तो हार जीत का फैसला आपसी द्वंद्व युद्ध से होता था। दोनों तबतक लड़ते थे जबतक एक की मृत्यु न हो जाये। जो जीवित बचता था वो विजेता माना जाता था।
यहां एक बात ध्यान देने की है। कृष्ण एक किशोर बालक थे। कंस एक well trained विख्यात योद्धा था। फिर कैसे हार गया? उसके मन में एक डर बैठा था कि देवकी का पुत्र मुझे मार देगा। और उसे पूरा भरोसा था कि कृष्ण ही देवकी का पुत्र है।युद्ध में ये बात बहुत मायने रखती है। अपने प्रतिद्वंद्वी की शक्ति में विश्वास करना हार का कारण बन जाता है। ऊपर से जनता के विद्रोह ने उसकी रही सही शक्ति भी नष्ट कर दी। वह पराजित होकर मारा गया।

मथुरा में फिर से लोक कल्याणकारी शासन स्थापित हुआ। इसके बाद हमें श्रीकृष्ण के राजनीतिज्ञ रूप के दर्शन होते हैं। कृष्ण की राजनीति मूलतः दो बातों पर केंद्रित थी। पहली बात, सज्जनों की सहायता करो। चाहे जैसे भी बन पड़े, उन्होंने हमेशा अच्छे लोगों की मदद की। दूसरी बात, दुष्टों का विनाश करो। दुर्जनों के विनाश हेतु उन्होनें कोई भी रणनीति अपनाने से परहेज़ नहीं किया। एक बार तो कालयवन नामक राक्षस के संहार हेतु वह युद्ध से पीठ दिखाकर भी भागे। जब कालयवन ने उनका पीछा किया तो कृष्ण ने उसका सामना राजा मुचुकुंद से करवा दिया। कालयवन मारा गया। इस घटना के चलते श्रीकृष्ण का एक नाम रणछोड़राय भी है।

सत्ता प्राप्त करने के बाद भी श्रीकृष्ण ने अपने आपको कभी राजा नहीं कहा। वो सिंहासन पर नहीं बल्कि जनसाधारण के बीच ही रहे। हमेशा आडंबर का विरोध किया। बलराम, अक्रूर,सात्यकि, कृतवर्मा, उद्धव जैसे सहायकों के साथ उन्होनें एक लोकतांत्रिक शासन की नींव डाली।

कृष्ण के युगान्तकारी विचार तत्कालीन निरंकुश शासकों की ईर्ष्या का विषय बन गए। मगध सम्राट जरासंध ने इन राजाओं का महासंघ बनाकर मथुरा पर आक्रमण कर दिया। अनेक वर्षों तक युद्ध के उपरांत श्रीकृष्ण ने एक चौकानें वाला निर्णय किया। मथुरा छोड़ दी। गुजरात के समुद्री तट पर द्वारिका नामक एक सुनियोजित नगर बसाया।इसके बाद द्वारकाधीश कहलाये। ये नगर सामुद्रिक व्यापार का केंद्र बन गया। द्वारिका राज्य की शक्ति और समृद्धि कुछ ही समय में बहुत बढ़ गयी। श्रीकृष्ण और बलराम ने नारायणी सेना बनाई जो भारत की सबसे शक्तिशाली सेनाओं में गिनी जाती थी।

कहा जाता है कि श्रीकृष्ण की कथाओं में जीवन के सूत्र छिपे हैं। कोई भी घटना लीजिये, आपको उसके केंद्र में एक क्रांतिकारी विचार मिलेगा। एक उदाहरण लेते हैं। कृष्ण और सुदामा की कहानी बहुत प्रसिद्ध है। इसमें क्या है? सुदामा कृष्ण के सहपाठी थे। सुदामा आगे जाकर एक बड़े विद्वान बने। हमेशा ज्ञान विज्ञान के शोध में रहते। लेकिन वो धन नहीं कमा पा रहे थे। पैसों की तंगी से जब उनका जीवन बेहाल हो गया तो कृष्ण के पास आये। कृष्ण ने खूब आदर किया। लेकिन सुदामा कुछ मांग नहीं पाए। जब सुदामा वापस अपने घर पहुंचे तो उन्होंने सब कुछ बदला हुआ पाया। उनकी पत्नी और परिवार के लोग कार्यों में जुटे थे। पैसे का आगमन कई स्त्रोतों से हो रहा था। यह आर्थिक तंत्र कृष्ण की ही कृपा थी। अब सुदामा निश्चिंत थे।

इस कहानी में दो गूढ़ बाते छिपी हैं। पहली बात, राजसत्ता को विद्वान और शिक्षक वर्ग का संरक्षण करना चाहिए। ये हमारे भविष्य के लिए जरूरी है। दूसरी बात, विद्वानों एवं शिक्षकों के  लिए खुद उनके द्वारा ऐसे आर्थिक तंत्र का विकास होना चाहिए जिससे पैसे के मामले में वो आत्मनिर्भर हो सकें। ऐसा क्यों ? ऐसा इसलिए, क्योंकि कोई जरूरी नहीं है कि शासक वर्ग हमेशा विद्वानों का आदर ही करे। सत्ता के लोभ में वो अच्छे विचारों का दमन भी कर सकता है। अगर विद्वान वर्ग आर्थिक रूप से सबल हो तो वो इसे झेलकर भी अपना अस्तित्व कायम रख सकता है।
कृष्ण अकेले ऐसे महानायक हैं जो कहते हैं-" मेरा स्मरण करके युद्ध करो" किससे युद्ध? हर उस परिस्थिति से जो आपको ठीक नहीं लगती।
आज बस यहीं तक। कृष्ण की बातें हम आगे भी करेंगे। आज यहीं छोड़ते हैं। आपकी अपनी वेबसाइट ashtyaam. com की तरफ से ढेर सारी शुभकामनाएं।


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