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योग: भारत में उत्पत्ति एवं विकास Yoga:Origin and Development

दोस्तों, पिछले दो लेखों में हमने योग का एक संक्षिप्त परिचय एवं महत्व समझा था।हमने ये भी जाना कि ये बहुत सारे लोगों के लिए लाभकारी सिद्ध हुआ है।
आज हम समझेंगे योग से संबंधित कुछ general बातों को।जानने की कोशिश करेंगें कि योग  का ये विज्ञान भारत में develop कैसे हुआ।
आइये, शुरू करते हैं।
अधिकांश लोग ये मानते हैं कि तरह तरह के आसनों और प्राणायामों को करना ही योग है। उनकी ये धारणा बहुत स्वाभाविक है।क्यों? क्योंकि टीवी कार्यक्रमों एवं एवं अखबारों में योग के इसी पहलू को दिखाया जाता है।
लेकिन ये पहलू सम्पूर्ण योग का एक बहुत छोटा हिस्सा है।ये ठीक उसी तरह है कि कोई भारत के बारे में जानना चाहे और उसे केवल दो- तीन राज्य दिखाकर छोड़ दिये जायें।
"तो सच क्या है?"
"सच ये है कि योगासन और प्राणायाम योग के केवल शारीरिक पहलू को represent करते हैं जिसे हठयोग भी कहा जाता है।अगर आप केवल इनको जानते हैं तो समझ लीजिए, आप योग को बीस प्रतिशत ही जानते हैं"
आइये, आराम से और बिल्कुल सरल ढंग से समझें।
आज से कई हजार साल पहले दुनिया आदिम युग में जी रही थी।लेकिन भारत तब बहुत developed था। यहां के लोग ईश्वर या कह लीजिए सत्य की खोज में लगे थे। क्यों लगे थे? क्योंकि सत्य को जान लेने से सृष्टि की सारी बातों पर अधिकार किया जा सकता है। सीधी बात है- ईश्वर अर्थात मूलतत्त्व को जान लेने पर हर तत्व बनाया जा सकता है। आधुनिक युग में ही ले लीजिए। कुछ समय पहले स्विट्जरलैंड में दुनिया के शीर्ष वैज्ञानिकों ने large hedron collider बनाया। 10 अरब डॉलर लगाकर बनाया। क्यों बनाया? ताकि मूलतत्त्व को खोज सकें जिसे गॉड पार्टिकल भी कहा जाता है।इगलर्ट और हिग्स नामक वैज्ञानिकों ने बरसों पहले इसकी कल्पना की थी जिसके लिए उन्हें 2013 में भौतिकी का नोबेल प्राइज भी मिला था।

तो देखा आपने! दुनिया अरबों डॉलर लगाकर जो आज ढूंढ रही है, वह कुछ लोगों के दिमाग में हजारों वर्ष पहले ही आ चुका था। फिर दुनिया इसको जानती क्यों नहीं! गुलामी की वजह से।कोई देश अगर गुलाम हो जाये तो उसकी सारी अच्छाइयों एवं उपलब्धियों को विजेताओं द्वारा मटियामेट कर दिया जाता है। क्यों? क्योंकि कोई तभी तक गुलाम रह सकता है, जबतक वो हीन भावना से ग्रसित हो। हमारे देश के साथ भी ऐसा ही था। जबतक हीन बने थे, गुलाम रहे। जब विवेकानंद, दयानंद,गांधी, सुभाष, भगतसिंह आदि जीते जागते लोगों ने हमें अपने गौरव का ज्ञान कराया तो आज़ादी मिलते देर नहीं लगी।

दोस्तों, वापस अपने मूल विषय पर आते हैं।हमने जाना कि प्राचीन भारत में कुछ लोग मूलतत्त्व या ईश्वर की खोज में लगे थे। ये लोग वनों में रहते थे और ऋषि कहलाते थे। जिस ऋषि के बहुत सारे followers होते थे, उन्हें महान ऋषि या महर्षि कहा जाता था। उस समय का शासक वर्ग इनको तन मन धन हर तरह से support करता था।
मूलतत्त्व की तलाश में लगे हमारे ये पूर्वज समय के साथ साथ अनेक विचारधाराओं में बंट गए। आखिर में छह विचारधाराएं बनीं।
आप यहां कह सकते हैं- ये जानने का क्या लाभ? लाभ है। अगर आपने इन छह विचारधाराओं को समझ लिया तो पूरे भारत की सोच को समझ लेंगे। ऊपर से देखने पर ये छहों एकदम अलग हैं ।इनकी संस्कृति अलग है। लेकिन हम पहले ही जान चुके हैं कि सबका मूल तो एक ही है। अब आपकी समझ मे आ रहा होगा कि भारत को विविधता में एकता का देश क्यों कहा जाता है।
आइये इन विचारधाराओं को समझें-
पहला है न्याय दर्शन।किसने दिया? महर्षि गौतम ने। क्या कहा? जो बात तर्क या logic से साबित होगी, हम वही मानेंगे।
दूसरा है वैशेषिक। किसने दिया? महर्षि कणाद ने। ये दुनिया के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने बताया था कि हर चीज़ परमाणुओं से मिलकर बनी है। वैशेषिक एक तरह से न्याय का ही जुड़वां भाई है। फिर फर्क क्या है? ये logic के प्रति उतना कट्टर नहीं है, कभी कभी आस्था को भी मान लिया करता है।
तीसरा है सांख्य। सांख्य मतलब?संख्याओं पर आधारित। ये लोग मानते हैं कि 25 तत्वों से मिलकर ही सब बना है। इन पच्चीसों को जानकर परम सत्य को जान सकते हैं। आधुनिक युग के वैज्ञानिक भी कुछ ऐसी ही सोच रखते हैं कि कुछ मूल तत्त्वों से मिलकर सब बना है जिनकी संख्या वर्तमान में 118 है।

चौथा है योग।वही योग,जिसे समझने का प्रयास हम कर रहे हैं। इसे महर्षि पतंजलि ने दिया। क्या बताया? योग के सिद्धांतों के पालन से समाधि अर्थात परम सत्य की प्राप्ति होती है।
पांचवां है पूर्व मीमांसा।किसने दिया? महर्षि जैमिनी ने।क्या बताया? वेद को मानो। वेदों में जो चीजें बताई गई है,उनका पालन करो।
छठा है उत्तर मीमांसा या वेदांत।किसने develop किया। तीन लोगों ने- आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, और मध्वाचार्य ने। इन्होंने क्या बताया? इन्होंने जो बताया, उसी के आधार पर आज के हिन्दू धर्म का ताना बाना बुना गया है। अगर आप हिन्दू हैं तो समझ लीजिए कि आपकी सोच पर इनमें से किसी एक का प्रभाव जरूर होगा।चाहे आपको पता हो या नहीं।

एक दिलचस्प चीज़ और जानते हैं।न्याय, वैशेषिक और सांख्य- इन तीनों में ईश्वर को ज्यादा भाव नहीं दिया गया था। इन तीनों को समझना हो तो शुष्क वैज्ञानिक सोच चाहिए। अतः ये पढ़े लिखे लोगों तक ही सीमित रहे। बाकी के तीन आम जनता में पॉपुलर हुए क्योंकि ये आस्था और विश्वास को भी स्थान देते थे।

दोस्तों,  हमारा ये लेख कुछ लंबा हो रहा है। अगले लेख में हम समझेंगे कि कैसे योग का आगे जाकर development हुआ जो पहले इन छह विचारधाराओं में से एक था।हम ये भी देखेंगे कि कैसे योग दर्शन का व्यवहारिक विकास हुआ और कैसे आम जनता इससे जुड़ने लगी।


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