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भारत का मुकुट: जम्मू कश्मीर- Part 1

14 फरवरी 2019।पुलवामा।केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल के जवानों का एक काफिला जम्मू श्रीनगर highway पर था।एक सिरफिरे एवं पागल आतंकवादी ने कायरों की तरह विस्फोट करके एक बस को उड़ा दिया।देश के लिए duty करते हुए चालीस जवान वहीं शहीद हो गए।
पिछले 15 दिनों से पूरे भारत में भावनाओं का ज्वार उमड़ पड़ा है।हर तरफ से बदला लेने की मांग हो रही थी।लिया भी गया।26 फरवरी को हमारे मिराज विमानों ने आतंकियों के जोश को जमींदोज़ कर दिया जिसे surgical strike 2.0 भी कहा गया।
आजकल हर तरफ इससे संबंधित खबरें जारी हैं।अतः विस्तार से लिखने की जरूरत नहीं।
पिछले दिनों एक मित्र के यहां गया। टीवी पर खबरें आ रही थीं। उनके 12 साल के बच्चे ने मुझसे पूछा- पाकिस्तान आखिर हमसे लड़ता क्यों रहता है? क्या हमारे जवान ऐसे ही मरते रहेंगे?
ये बहुत छोटे सवाल थे।लेकिन मैं विचलित हो उठा।क्यों? मैं इसका सटीक उत्तर नहीं जानता था।और बच्चे को कोई काल्पनिक उत्तर देना ठीक नही था। सवाल को टाल गया।जरूरी काम बताकर मित्र से विदा ले ली।
घर आया। इतिहास की पुस्तक पलटी।wikipedia देखा।internet पर लेख पढे।युद्धों को पढ़ा।इसी क्रम में यह निर्णय किया कि मुझे जो भी जानकारियां प्राप्त होंगी, मैं अपनी वेबसाइट के माध्यम से आपतक पहुँचाऊँगा। ताकि जब भी अगली पीढ़ी हमसे ये सवाल करे तो हम उन्हें सटीक उत्तर दे सकें।
बताइये भारत- पाक में दुश्मनी क्यों है? 10 में 8 लोग जवाब देंगे- कश्मीर को लेकर। कुछ लोग इसके पीछे धार्मिक एवं सांस्कृतिक कारण भी मानते हैं जिसके चलते कटुता चलती ही रहती है।
आइये कश्मीर समस्या की जड़ों को खोजें।इतिहास में चलें।
एक पुस्तक है-राजतरंगिणी।900 साल पहले कल्हण ने इसे लिखा। इसमें क्या है? 11वीं सदी तक का कश्मीर का इतिहास है। क्या लिखा है? एक समय यह क्षेत्र अशोक महान के अधिकार में था। बौद्ध धर्म प्रचलित था। फिर छठी सदी में विक्रमादित्य का राज आया।हिन्दू धर्म प्रमुख बन गया।प्रख्यात शासक अवन्तिवर्मन ने श्रीनगर के निकट अवंतीपुर नगर बसाया जो अपनी शांति, सौंदर्य एवं समृद्धि के लिए भारत प्रसिद्ध था। अवंतिपुर? वहीं, जहां आजकल गोलियां चल रही हैं? जी हां! वही अवंतिपुर।तेरहवीं सदी तक कश्मीर शांति एवं समृद्धि में स्वर्ग को भी मात देता था।
इसके बाद कश्मीर में इस्लामिक शासन आया।लेकिन आम जनता पर फर्क नहीं पड़ा।इसी दौर में जैनुल अबिदीन जैसे शासक भी हुए जो अपनी सहिष्णुता, ईमानदारी एवं लोककल्याण के चलते बहुत लोकप्रिय हुए। आगे जाकर कश्मीर पर मुगलों ने अधिकार कर लिया। इसे अपने hill station की तरह maintain किया और इसे धरती की जन्नत कहा। जब भी छुट्टी मिलती, वे निकल पड़ते कश्मीर की तरफ।
मुगलों के बाद कश्मीर सिखों के साम्राज्य में आ गया। आगे जाकर अंग्रेजों ने इसे सिक्खों से ले लिया और गुलाब सिंह को यहां का राजा बना दिया। उनके परिवार में आगे जाकर हरि सिंह ने सत्ता संभाली। हरिसिंह के समय एक ऐतिहासिक घटना घटी। भारत एवं पाकिस्तान आज़ाद हो गए। दोनों ही देश चाहते थे कि कश्मीर उनके साथ आ जाए।
अब शुरू हुआ वह दौर जहां भारत पाक दुश्मनी की जड़ें छिपी हैं।
पाक-"हमारे साथ आना पड़ेगा क्योंकि कश्मीर घाटी के लोग हमारी कौम के हैं"।
भारत-" जम्मू व लद्दाख क्षेत्र की जनता हमारे साथ है। कश्मीर घाटी की धर्मनिरपेक्ष जनता भी हमारे साथ है। अतः हमारे साथ आ जाओ"।
हरिसिंह-" क्या करूँ??? कुछ समझ नहीं आ रहा! थोड़े दिन बाद कहूंगा।"
पाकिस्तान ने थोड़े दिन का इंतज़ार नहीं किया और हमला कर दिया। उसकी फौज श्रीनगर के पास आ गयी।
हरिसिंह-" भारत, हमारी रक्षा करो"।
भारत-" पहले हमारे साथ आ जाओ, तब रक्षा करेंगे"।
हरिसिंह-" मैं तैयार हूं।पर मुझे कुछ विशेषाधिकार चाहिए'।
भारत-" कैसे अधिकार?"
हरिसिंह-" हमारा झंडा, हमारा संविधान कायम रहेंगे। आपका कोई भी कानून हमारी सहमति के बिना यहां लागू नहीं होगा।"
 भारत के नेताओं ने सोच विचार किया-
नरमपंथी नेता- जो मांगता है दे दो। नहीं दिया तो वो हमारे साथ नहीं आएगा।
गरमपंथी नेता- विशेषाधिकार देने की जरूरत नहीं। वैसे भी पाक कब्जा करने ही वाला है। हम सीधा पाक से ही छीन लेंगे।
लेकिन इतिहास बताता है कि जीत नरमपंथियों की हुई।
भारत- ये लो जी धारा 370। जो-जो आपको चाहिए था, सब दे दिया।
हरिसिंह- " ठीक है, अब कश्मीर आपका हुआ"
पाकिस्तान- ऐसे कैसे? पहले हमसे लड़ो। जो जीतेगा, कश्मीर उसी का होगा।
इसके बाद पहला भारत पाक युद्ध हुआ । पाक फौज को जम्मू कश्मीर के अधिकांश हिस्से से भगा दिया गया।
पाकिस्तान- देखो, आपने ठीक नहीं किया। अब हम संयुक्त राष्ट्र के पास जाएंगे।
भारत- पहले हम ही चले जाते हैं।
संयुक्त राष्ट्र- लड़ाई बंद कर दो, जो जहां है वहीं रहे। जनमत संग्रह करके जनता से ही पूछ लो।
पाक- जी, बहुत बढ़िया। हमारे कब्जे में जो कश्मीर है उसे हम आजाद कश्मीर का दर्जा देंगे।
भारत- मुझे तो संयुक्त राष्ट्र से ऐसी उम्मीद नहीं थी।
इस तरह हम देखते हैं कि संयुक्त राष्ट्र में जाकर किस तरह एक ऐसी समस्या का बीजारोपण कर दिया गया जिसकी कीमत देश अबतक चुका रहा है यह समस्या सन 1947 में फौज से हल हो जाती। लेकिन संयुक्त राष्ट्र में जाकर एवं जनमत संग्रह की बात पर चुप्पी साधकर हमने भावी पीढ़ियों को भी इस संघर्ष में झोंक दिया।

दोस्तों, इस article में  हमने कश्मीर समस्या के ऐतिहासिक पहलू को समझा। ये लेख काफी लंबा हो रहा है। अतः इस लेख के अगले भाग में हम पढ़ेंगे कि इस समस्या को कैसे आने वाले समय में और जटिल बनाया गया। हम यह भी देखेंगे कि इसके समाधान के लिए दुनिया के विशेषज्ञों की क्या राय है। सबसे बढ़कर, हम उन दो सवालों का उत्तर प्राप्त करेंगे जिनकी चर्चा इस लेख के शुरू में ही हो चुकी है।
आपकी अपनी वेबसाइट ashtyaam.com से जुड़ने के लिए धन्यवाद!



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