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लोक आस्था का प्रतीक: सूर्य Lok aastha ka pratik: Surya

धार्मिक आस्था की सरहदें नहीं होतीं। इसका एक प्रमाण मुझे कुछ दिन पहले मिला जब कनाडा के रहनेवाले एक मित्र ने मुझसे छठपूजा और सूर्य उपासना से संबंधित जानकारी मांगी।ये जानना सुखद लगता है जब सात समंदर पार का कोई व्यक्ति आपके यहाँ के लोकपर्व में रुचि दिखाए। उनको जबाब देने के बाद सोचा कि आपकी अपनी इस वेबसाइट पर भी इसपे आधारित लेख लिखा जाए।
चलिए शुरू करें।
सूर्य उपासना क्या है? तरह तरह के मंत्रों, विधि विधानों, स्तुतियों से सूर्य के प्रति अपनी श्रद्धा दिखाना ही सूर्य उपासना है। प्रसिद्ध गायत्री मंत्र सूर्य उपासना से ही संबंधित है।
सूर्य का महत्व क्या है?मानव इतिहास के प्राचीनतम उपलब्ध साहित्य वेदों में सूर्य को सृष्टि की आत्मा कहा गया है।यजुर्वेद में सूर्य को ईश्वर का नेत्र कहा गया है।यही कारण है कि हिन्दू अपने अधिकांश धार्मिक कार्यों को दिन में ही करते हैं जब आकाश में सूर्य की उपस्थिति होती है।
छठपूजा क्या है? ये सूर्य की उपासना का ही एक तरीका है जो मुख्यतः बिहार ,पूर्वी उत्तर प्रदेश एवं झारखंड में प्रचलित है। इसमें कोई लिखित मंत्र नहीं होते।लोकगीतों के माध्यम से सूर्य की स्तुति होती है।आगे जाकर इसमें षष्ठी देवी की उपासना भी समाहित हुई जो भक्तों को संतान प्रदान करती हैं। इस पर्व में local रीति रिवाजों का पालन होता है जिनका इतिहास हजारों साल पुराना है। ये पर्व दीपावली के बाद मनाया जाता है।
सूर्य उपासना का इतिहास क्या है?
वेदों की रचना भले भारत में हुई लेकिन सूर्य विज्ञान अर्थात सोलर science में देश बहुत पीछे था। तो आगे कौन था? ईरान  सूर्य विज्ञान में सबसे आगे था। कौन ईरान? वही जो अमेरिका के साथ लुका- छिपी खेलता रहता है! जी हाँ, वही ईरान।
ईरान सूर्य विज्ञान में आगे कैसे हो गया था? इसका कारण था। वहां इस विज्ञान के विशेषज्ञ विद्वानों का एक पूरा समूह था जिन्हें मग कहा जाता था। जिस तरह से आज अमेरिका की नासा NASA अंतरिक्ष विज्ञान में सबसे आगे है, उसी तरह ये मग लोग भी solar science में सबसे आगे थे।
आखिर ये सूर्य विज्ञान important क्यों था? बिना किसी औषधि के रोगों को नष्ट करने के लिए, अपना यौवन और स्वास्थ्य बनाये रखने के लिए एवं संसार में मनचाहे परिवर्तन लाने के लिए।
आइये एकदम सरल तरीके से समझें। सोचिये- सूर्य के प्रकाश से क्या क्या हो सकता है? सोलर प्लेट लगाकर सूर्य की ऊर्जा को use कर सकते हैं। आप बल्ब जला सकते हैं, खाना बना सकते हैं, गाड़ी चला सकते हैं। किसी दर्पण की मदद से इस प्रकाश को रिफ्लेक्ट करके आप signal भेज सकते हैं जिसे हेलियोग्राफ भी कहा जाता है।
सूर्य का प्रकाश मानव शरीर में भी परिवर्तन लाता है।विटामिन डी बनने की बात तो सभी जानते हैं। इसके अलावा आयुर्वेद में इसके कई अन्य लाभ भी बताए गए हैं।
इस तरह हमने देखा कि सूर्य विज्ञान एक परिवर्तनों का विज्ञान है जिसके सबसे बड़े विशेषज्ञ मग लोग गंगा यमुना की धरती से काफी दूर बैठे थे। भारत के कई विख्यात राजकुलों की उत्पत्ति सूर्य से मानी गयी है अतः सांस्कृतिक आदान प्रदान की प्रक्रिया रूटीन के तौर पर चलती रही।
महर्षि अगस्त्य ने त्रेता युग में इस दूरी को कम किया। भारत में कई जगहों पर इसके अध्ययन केंद्रों की स्थापना हुई। भगवान राम जब रावण से लड़े तो महर्षि ने उन्हें आदित्य हृदय नामक कवच दिया। इसका अर्थ क्या है? इसका अर्थ है सूर्य को अपने हृदय में धारण करना। अर्थात सूर्य विज्ञान solar technology का इस्तेमाल।
द्वापर युग में मग लोगों के लिए ईरान एक अच्छी जगह नहीं रह गया क्योंकि वहां के शासक वर्ग का ह्रास हो चुका था। जब राजा अपने स्वार्थों एवं सुविधाओं में खो जाए तो वैज्ञानिक वर्ग की दशा खराब होने लगती है और वे देश छोड़कर जाने लगते हैं। मगों का भी यही हुआ। वो भगवान श्रीकृष्ण के बुलावे पर आकर बिहार के नए बस रहे क्षेत्र में establish हो गए जिसका नाम उनके नाम पर मगध पड़ा। कुछ संख्या इनकी राजस्थान एवं अन्य जगहों  में भी गयी। जहां भी ये पहुंचे, सूर्य मंदिरों का इन्होंने निर्माण कराया। हर मंदिर में सूर्य की मूर्ति, सूर्य यंत्र, एवं कुछ उपकरण रखे गए। सूर्य उपासना इस क्षेत्र में extremely popular हो गयी। इन्होंने इसे सरल बनाकर जन जन से जोड़ दिया।
इसके बाद की कोई प्रामाणिक कहानी नहीं मिलती। लेकिन ऐसे संकेत जरूर मिल जाते हैं जब इन्होनें मौर्य वंश के निकम्मे एवं जनविरोधी शासकों का प्रतिरोध किया था।फिर बौद्ध धर्म के प्रचंड प्रभाव ने इनको एक किनारे पर डाल दिया।
1200 ईसवी के आस पास बख्तियार खिलजी ने बिहार के इलाकों में खूब उधम मचाया। अहिंसा को ही परम धर्म मानने वाले बौद्ध लोगों की उसने युद्धविज्ञान के पेपर में परीक्षा ली जिसमें वे फेल हो गए। इसके बाद खिलजी ने अपना जलवा दिखाया। नालंदा, विक्रमशिला , ओदान्तपुरी जैसे world famous शिक्षा केंद्रों को तोड़ फोड़ कर मटियामेट कर डाला। सूर्य उपासना के केंद्र भी इससे बच नहीं पाए।
उथल पुथल खत्म होने के बाद स्थानीय सूर्यवंशी राजाओं के द्वारा इनका पुनर्निर्माण कराया गया। तबसे लेकर अबतक ये मंदिर लोक आस्था के केंद्र बने हुए हैं। सूर्य विज्ञान की बात तो गए जमाने की हो गयी। हां, पर्व की जो परंपरा यहां की जनता ने  हजारों साल पहले शुरू की थी, वो ज्यों की त्यों चली आ रही है।
 अगर आप चाहें तो आज भी लोक आस्था की शक्ति को देव, उमगा,सूर्यकुंड आदि के सूर्य मंदिर में आकर महसूस कर सकते हैं जहां छठ पूजा के दौरान लाखों की संख्या में श्रद्धालुओं को आप लोकगीतों के माध्यम से सूर्य की उपासना करते देखते हैं।बिहार में स्थित इन सूर्य मंदिरों को पर्यटन विभाग के द्वारा अच्छी तरह विकसित किया गया है जहां पर्यटकों के लिए पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध हैं।
सूर्य देव की एक प्रतिमा।

यही है प्राचीन सूर्य यंत्र।इससे ज्यादा कुछ मालूम नहीं।काला अक्षर भैंस बराबर वाली स्थिति है।



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