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Internet: Reach and Impact

कुछ दिन पहले की बात है। मेरे एक भूतपूर्व सहयोगी प्रमोद की call आयी।
प्रमोद- भैया, एक सलाह चाहिए।
मैं- सब ठीक तो है?
प्रमोद- भइया, अंशु का व्यवहार बदल गया है।
इतना सुनते ही मुझे काफी आश्चर्य हुआ। अंशु इसके लड़के का नाम है जो 10th class का विद्यार्थी है।
प्रमोद- आप उसको समझाओ। हमलोगों की बात सुनने को तैयार ही नहीं।
मैं- बात क्या है?
प्रमोद- कल शाम को उसके net pack की validity खत्म हो गयी थी। उसने रिचार्ज करने के लिए 500 रुपये मांगे जो मैंने नही दिया। उसने बहस की तो मैंने डांट दिया। बस तभी से गुमसुम है।
मैं- उसका नंबर दो।
समस्या का तुरंत समाधान जरूरी था नही तो आज की युवा होती generation कोई भी कदम उठा सकती है।उसका नंबर लेकर मैंने फट से 509 रुपये का recharge किया जिसमें 4 GB डाटा प्रतिदिन मिलता है। इसके बाद अंशु को whatsapp call किया।
मैं- अंशु बेटा, तुमसे बहुत जरूरी काम है।इसी वजह से मैंने तुम्हारा net recharge भी करवा दिया है।मेरा काम भी करो और मजे से game भी खेलो।
अंशु-???
मैं- मुझे किसी को खूब अच्छे अच्छे goodmorning मैसेज व्हाट्सएप पर भेजना है। तुमको तो ये सब बहुत अच्छा आता है। जल्दी से download करके मुझे भेज। देखो सारे messages एकदम unique होने चाहिएं।
अंशु- भेजता हूँ।
अब मैने प्रमोद को फ़ोन लगाया।
प्रमोद- भइया, समझाये उसको?दिन-रात फ़ोन पे लगा रहता है।दीन दुनिया से कोई मतलब नहीं रहा उसे।
मैं- वो तो समझ गया। अब तू समझ ले।एक क्लीनिक का address देता हूँ। बच्चे को वहां ले जाकर दिखाओ। सब ठीक हो जाएगा।और हाँ, उससे फ़ोन छीनने की गलती मत करना।


आप कहेंगे, इसमें सुनाने वाली क्या बात है? बात है, बहुत ही सीरियस बात है। एक चौदह-पंद्रह साल का लड़का अगर कई घंटों तक ऑनलाइन गेम खेलता रहे, internet की लत में अपने माँ बाप को भी भूल बैठे, एक दिन भी facebook और whatsapp से दूरी बर्दाश्त न कर सके और दरवाज़ा बंद करके रुठ जाए, ये तो बहुत ही गंभीर बात है।समाज में चारों तरफ ऐसी घटनायें देखने को मिल जाएंगी जो कहीं न कही मोबाइल की लत एवं एवं इसके side effects की वजह से शुरू होती हैं।
आइये, थोड़ा समय निकालें और इस समस्या के कारणों,  लक्षणों को जानें। आगे हम ये भी जानेंगे कि कैसे बहुत ही सरलता के साथ mobile addiction की इस समस्या से न केवल खुद बच सकते हैं बल्कि जो लोग इसके शिकार हैं, उन्हें भी बचा सकते हैं।

आज से काफी पहले, 1995 में विख्यात अमेरिकी psychiatrist डॉ इवान गोल्डबर्ग ने बताया था- मोबाइल एवं internet का हद से ज्यादा इस्तेमाल मानव शरीर एवं दिमाग में अनेक तरह की बीमारियों को पैदा करता है।
उस वक़्त बहुत से लोगों की समझ में बात नहीं आयी। mobile और internet तो लोगों की सुविधा एवं ज्ञान के लिए विकसित हो रहे थे। फिर खतरा कैसा? लेकिन चिकित्सकों की समझ में आ चुका था- कुछ करना पड़ेगा!


आज 2019 में साबित हो चुका है- डॉ गोल्डबर्ग सही थे। AIIMS की रिपोर्ट कहती है- Mobile और internet  से होनेवाली समस्याएं हर दो साल में दुगुनी हो रही हैं।
भारत सरकार के आंकड़ों के अनुसार- 15 से 35 आयुवर्ग में करीब पंद्रह से बीस प्रतिशत लोग किसी न किसी mental डिसऑर्डर से जूझ रहे हैं जिनमें अधिकांश लोगों को इसका उपचार नहीं मिल पाता। नतीजा? बताने की जरूरत नहीं, कोई भी newspaper उठाइये और खबरें पढ़ लीजिये।

आइये समझते हैं- आखिर ये internet addiction होता कैसे है? जबतक आप अपने हिसाब से internet चलाते हैं तबतक ये आपका सेवक है। जैसे ही internet के हिसाब से आप चलना शुरू कर देते हैं- वैसे ही यह addiction बनकर समस्याओं की जड़ बन जाता है।कैसे? बहुत आसान है। whatsapp और फेसबुक पर आप अपनी इच्छा से आते है। कुछ ही दिनों में आपके ढेर सारे मित्र बन जाते हैं।एक आभासी दुनिया बन जाती है।लाइक, पोस्ट, कमेंट और शेयर पर चलनेवाली यह आभासी दुनिया धीरे धीरे आपकी स्वतंत्र सोच पर हावी होने लगती है और इसमें अपनी image को बनाकर रखना आपकी विवशता हो जाती है।
इससे क्या होगा?हम एक ऐसी प्रतिस्पर्धा में फंस जाएंगे जो हमें busy तो रखेगी पर लाभ नहीं पहुचाएगी।इसआभासी दुनिया में अपनी image बनाने के फेर में हम अपनी जड़ों से कटना शुरू कर देते हैं।घर, परिवार, देश ,समाज सबसे दूर होकर ऐसी स्थिति में पहुँच जाते हैं जब वास्तविक जिंदगी का एक छोटा सा झटका बुरी तरह विचलित कर देता है। हमारी युवा हो रही पीढ़ी अक्सर इन झटकों को नही सह पाती।
अब कुछ examples देखते हैं-
नोएडा में मेरे एक मित्र ने facebook पर भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मुहिम चलाई। हजारों लोग जुड़े।तय हुआ,एक दिन इकठ्ठा होकर धरना दिया जाए। कौन क्या करेगा- सब ऑनलाइन तय हुआ।निर्धारित तिथि को केवल दस पंद्रह लोग ही जुटे।बाकी सभी  फेसबुक पर ही support करके निकल लिए। मित्र ने इस दिन सबक सीख लिया कि समाज से जुड़ने का रास्ता समाज के ऊपर से नहीं बल्कि उसके बीच से जाता है।आज वो एक विख्यात समाजसेवक के रूप में जाने जाते हैं।
यहां एक बड़ा विचित्र प्रश्न हमारे सामने आता है- क्या हमें internet इस्तेमाल करना सीखना पड़ेगा? उत्तर है हां। हमें सीखना ही पड़ेगा। और उनको भी सिखाना पड़ेगा जिनके हाथों में हम पहली बार स्मार्टफोन दे रहे हैं।इसमें क्या जरूरी है? ये जरूरी है कि हम एक निश्चित समय के लिए ही इस टेक्नोलॉजी का प्रयोग करें, अपने लक्ष्यों की प्राप्ति में इसे सहायक बनाएँ। इसके addiction की नौबत न आने दें।

अगर कोई इस addiction का पहले से ही शिकार हो तो क्या करना चाहिए?
चार काम करिये।
पहला।Notifications को ऑफ कर दीजिए। मतलब? जब भी कोई मैसेज आता है तो फ़ोन से एक sound निकलती है न? इसी को सेटिंग में जाकर ऑफ कर दीजिए।यही sound आपको बार बार मैसज आने की सूचना देकर उसे देखने पर मजबूर करती है।
दूसरा।किसी outdoor activity को अपनाएं। खेलकूद, घूमना फिरना, कहीं की यात्रा, नदी तालाब के किनारे घूमना, मंदिर जाना, ये सब किसी भी addiction के दुश्मन हैं।

तीसरा।अपनी नींद सही करिये।अगर किसी को बिना फ़ोन देखे रात को नींद नही आती हो तो? बिना एक पल सोचे किसी भी अच्छे डॉक्टर के पास जाइये।नींद की दवा लिखवा लाइये।रात को खाइये और नींद लीजिये।चार पांच दिनों में आपकी नींद का क्रम सही हो जाएगा।अब दवा बंद कर दीजिए।
चौथा।किसी महापुरुष को follow करिये। जैसे? स्वामी विवेकानंद,दयानंद, अरविंद किसी को भी,जिसे आप चाहें।इससे क्या होगा? आपकी रुचि इनके विचारों को पढ़ने में जागृत होगी। इनसे आपका मन शक्तिशाली बनेगा। फिर तो किसी भी addiction को छोड़ना बहुत आसान है।

अंत में धन्यवाद, उन सभी लोगों का जो पिछले थोड़े से समय में ही एक बड़ी संख्या में हमसे जुड़े हैं।विश्वास है, आपकी अपनी वेबसाइट ashtyaam. com आपकी अपेक्षाओं पर खरी उतरेगी।








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