Skip to main content

तर्कसंगत सोच की शक्ति:Rational Thinking

एक व्यापारी था।उसके चार बेटे थे।चारों देखने में, बात करने में तो अच्छे-खासे थे।लेकिन एक कमी थी।रात में उन्हें दिखाई कम देता था लेकिन ये बात परिवार से बाहर कोई नहीं जानता था।व्यापारी अपनी बुद्धिमानी से सब संभाल लेता था।
समय गुजरता गया।व्यापारी वृद्ध हो चला था।अब किसी को उत्तराधिकारी बनाना था।लेकिन समस्या आ गयी।हर बेटा अपने आप को सबसे अच्छा मानता था।तो किसको चुना जाए?
एक उपाय निकला।व्यापारी ने एक मंदिर बनवाया था।उसका उदघाट्न inaugration होने वाला था। ये तय हुआ कि चारों लड़के उस मंदिर में जाएंगे। जो भी वहाँ का सबसे बारीक एवं सटीक वर्णन करेगा वही उत्तराधिकारी बनेगा। Date निश्चित हो गयी।
चारो लड़के competition जीतने की तैयारी में लगे।
बड़े लड़के को भरोसा था कि वही सबसे काबिल है।और बाकी तीनों मूर्ख हैं।उसने एक डायरी निकाली। पुजारी को बुलाया जिसे पूजा के लिए रखा गया था।उससे पूछा-अगर कोई पूछे तो मंदिर का वर्णन कैसे करना चाहिए।पुजारी ने जो उत्तर दिया,उसने Diary में लिख लिया। उसे याद कर लिया।
दूसरे की योजना थोड़ी अलग थी। वो समझ चुका था- किसी ऐसे व्यक्ति से पूछना होगा- जो उस मंदिर में आता जाता हो। उसने अपने पिता के मुनीम को पकड़ा। पूछा- मंदिर की बारीकियां बताइये। मुनीम जी तो मंदिर निर्माण से शुरू से जुड़े थे।उन्होंने बताया। लेकिन उनके वर्णन में financial terms ज्यादा थीं।जैसे, कौन सी चीज सस्ती या महंगी है।कहाँ से मंगाई गई है।कौन सा material लगा है। यही सब।

तीसरा लड़का कुछ ज्यादा सामाजिक था।उसने उन तमाम कारीगरों को बुलाया। राजमिस्त्री, लोहार और पेंटर।जिन्होनें मंदिर को construct किया था,खिड़कियां -दरवाजे बनाये थे, एवं पेंट किया था। इन सबसे मंदिर का वर्णन पूछकर उसने अपनी डायरी में लिख लिया।

चौथे लड़के की योजना तीसरे से मिलती जुलती, पर थोड़ी अलग थी।उसने पता किया।मंदिर का वास्तुविद यानी architect कौन है।वह उनसे मिला।पूरा नक्शा map ले लिया।कौन सी चीज मंदिर में कहां,क्यों रखी गयी है, इसे अच्छे से समझा। इसको अपने दिमाग में बिठाया।अब पुजारी से मिलकर मूर्ति की विशेषताओं को समझा।राजमिस्त्री,बढई, लोहार और पेंटर से मिलकर मंदिर का construction समझा। मुनीम से मिलकर  मंदिर के बजट और वित्तीय प्रबंधन के बारे में पता किया। अब उसकी जानकारी सम्पूर्ण थी।
परीक्षा की तिथि आयी।व्यापारी सबको रात में मंदिर ले गया।एक घंटा तय था।लड़के तो पहले ही तैयारी कर चुके थे।एक घंटा बिताने के बाद वो घर आ गए।अगले दिन सुबह में व्यापारी ने सबको बुलाया।बोला- जो भी देखा, उसका वर्णन लिखकर दो।
बड़े लड़के ने सबसे पहले लिखकर कागज़ जमा कर दिया! फिर दूसरे ने।फिर तीसरे ने।सबसे अंत में चौथे ने।
बड़े लड़के ने मूर्ति का और मंदिर में गाये जा रहे मंत्रों का बड़ा जीवंत वर्णन किया था।  देवता ने कौन से वस्त्र और आभूषण धारण किये थे,यह तक लिखा था।
दूसरे लड़के ने मंदिर की वस्तुओं के बारे में सटीक आर्थिक जानकारियां लिखी थी। जैसे मंदिर में कितने वजन और मूल्य के कितने घंटे लगे हैं, कहाँ से मंगाया गया संगमरमर लगा है- ये सब।
तीसरे लड़के ने मंदिर की सजावट, दरवाजों, एवं बनावट के बारे में लिखा था।
और चौथा लड़का?
वो तो कुछ लिख ही नहीं पाया था।उस वक़्त गाये जा रहे मंत्रों, उस वक़्त जल रही अगरबत्ती के बारे में ही लिख पाया था। वो मूर्ति के बारे में भी नहीं लिख पाया।बनावट भी नहीं।
सबको लगा- पहला या तीसरा लड़का जीतेगा।
लेकिन ये नहीं हुआ।
व्यापारी ने चौथे लड़के को अपना उत्तराधिकारी चुना। वजह? वो लड़कों को अपने वाले मंदिर ले ही नहीं गया था! वो लोग अपने वाले मंदिर से ठीक सटे हुए दूसरे मंदिर में ले जाये गए थे!
देखा आपने! जैसे ही मंदिर बदल दिया गया, वर्णन automatically गलत हो गए।केवल चौथा लड़का ही था जिसके द्वारा किया गया description वास्तविकता के सबसे करीब था।  अतः वो जीत गया।
हमारे जीवन में भी अक्सर ये होता है। हमारी शिक्षा प्रणाली में हमें इस प्रकार programme किया जाता है कि ये जानी पहचानी स्थितियों में ही हमारी सहायता करती है। अनजानी,अनदेखी परिस्थितियों में ये धरी की धरी रह जाती है! क्यों? वहां तर्कसंगत सोच यानी rational thinking चाहिए। हमारी वर्तमान प्रणाली जो केवल exam पास करने और तथ्यों को रटने पर फोकस करती है, वह exam का pattern बदल जाने पर किसी काम की नहीं रहती।
आपने भी अनुभव किया होगा। जिस चीज़ को आप खूब अच्छे से समझ लेते हैं, उससे जुड़े हुए किसी भी प्रश्न का उत्तर देने में आसानी होती है। चाहे pattern बदल जाये, हमारा ज्ञान फिर भी काम आता ही है।
ये बात हमारे व्यक्तिगत जीवन में भी लागू होती है। अधिकांश लोगों के प्रति हमारी सोच पहले से ही programmed होती है। वह अच्छा है।वह खराब है।वह नालायक है।हम पहले से ही सोच कर बैठे होते हैं। अगर किसी ने हमें देखकर good morning नहीं कहा,हमारा फ़ोन नहीं उठाया, हमारे whatsup मैसेज का जबाब नहीं दिया ,तो उसे घमंडी egoist समझ बैठते हैं।
लेकिन अगर rational thinking को अपनाया जाए तो हम इन negative चीजों से बच सकते हैं। कैसे? देखते हैं।एक व्यक्ति सोसाइटी के दरबान पर गुस्सा हो रहा था।कारण? पिछले कुछ दिनों से,जब भी उनकी गाड़ी आती वह गेट खोलने में देर करता। जब भी पुकारो, जल्दी नहीं सुनता। वे समझ रहे थे कि दरबान जान बूझकर उनका अपमान करता है। सुबह सुबह उसे देखकर दिन भर उनका मूड खराब रहता।उन्होंने तय किया- इसे नौकरी से निकलवा दूंगा। उनका दिमाग इसके लिए programmed हो चुका था कि ये व्यक्ति खराब है।
लेकिन एक अच्छी चीज हुई।उनके एक दोस्त ने कहा- कारण पता करो- क्यों ये तुम्हारे साथ ऐसा व्यवहार करता है।
Enquiry शुरू हुई।उस दरबान के कान के पर्दे किसी बीमारी से damage हो रहे थे। उसकी सुनने की क्षमता बाधित हो गयी थी। इलाज चल रहा था।उसने कई बार उनको बताने की भी कोशिश की थी। लेकिन हर बार वे गुस्से भरा चेहरा बना लेते और निकल जाते!
लेकिन कारण पता चल जाने पर सब सही हो गया।उन्हें पता चल गया कि उनके प्रति दरबान के मन में कोई दुर्भावना नहीं थी।
हमारे सामाजिक रिश्तों में भी अक्सर यही होता है। हमें ऐसा लगता है कि कोई हमारी उपेक्षा कर रहा है, और हम उससे कटने लगते हैं। लेकिन वास्तविकता कुछ और ही होती है! Rational thinking  यहां पर बहुत उपयोगी है।
लेकिन ये develop कैसे होती है? वैज्ञानिक सोच के द्वारा।अपने मानसिक अहंकार को त्यागकर। विरोधी प्रतीत होनेवाले विचारों का सम्मान करके।
आइये हम भी तय करें।पूर्वाग्रह से मुक्त होकर सोचने के लिए।सत्य को जानने के लिए।वास्तविक सोच के आधार पर ही किसी के बारे में दृष्टिकोण बनाने के लिए!



Comments

Popular posts from this blog

त्रिजटा: राक्षसी से देवी तक Trijata: From demon to Goddess

दोस्तों, आज हम बात करेंगे त्रिजटा के बारे में। रामायण का यह एक ऐसा पात्र है जिसकी चर्चा बहुत कम होती है।

त्रिजटा को सीताजी ने बड़े प्रेम से मां कहा था। यह सौभाग्य और किसी को कभी नहीं मिला! सीताजी ने त्रिजटा से न केवल अपनी व्यथा सुनाई, बल्कि चिता जलाने के लिए मदद भी मांगी!त्रिजटा ने समझाया और मनाया।ठीक उसी तरह जैसे एक मां अपनी बेटी को डांटकर प्रेम से समझाती है।ये अवसर भी किसी और को नहीं मिला!

दोस्तों, श्रीराम को अवतार और सीताजी को उनकी शक्ति बताया गया है। परमशक्ति भी किसी से सहायता मांग बैठे, यह प्रसंग आपको कहीं नहीं मिलेगा!

ऐसे वर्णन मिलते हैं कि त्रिजटा एक राक्षसी थी! रावण की सेविका थी! लेकिन बाद में उसका एक आदर्श स्वरूप देखने को मिलता है!

दोस्तों, आज के इस लेख में हम उन घटनाओं एवं परिस्थितियों को देखेंगे जिन्होंने एक साधारण सेविका को रामकथा में एक बहुत ऊंचे और श्रद्धेय स्थान की अधिकारिणी बनाया।

आईए, शुरू करते हैं।

त्रिजटा के पूर्वज शुरू से ही लंका राज्य के सेवक रहे थे। त्रिजटा ने भी कुलपरंपरा के अनुसार रावण की सेवा की। वृद्धा वस्था आने पर उसे एक आरामदायक और सम्मानित पद दिया गया। वह …

नहुष: एक पौराणिक कहानी Nahush: A story from Puranas

मित्रों, विश्वास है कि ये वेबसाइट आपको कुछ अच्छे विचारों से अवगत कराने में कारगर हो रही है! इसके पीछे आपलोगों का ही प्रेम और स्नेह है।

आज हम एक पौराणिक कहानी लेंगे और इसका ऐतिहासिक, वैज्ञानिक और तार्किक विश्लेषण करेंगे। हम देखेंगे कि हिन्दू धर्मग्रंथों की ये कहानी केवल कपोल कल्पना नहीं है।आप धार्मिक आस्था को परे रखकर अगर इसका इतिहास और विज्ञान की कसौटी पर तार्किक विश्लेषण करें, तो यह कहानी अपने असली स्वरूप में सामने आती है!

आइये, शुरू करते हैं।

राजा नहुष का वर्णन महाभारत में आता है। वह बहुत शक्तिशाली और लोकप्रिय राजा थे। उनके राज्य की शासन व्यवस्था को आदर्श माना जाता था।धर्म की उच्चतम मर्यादाओं पर आधारित शासन चलानेवाले नहुष का देवता भी सम्मान करते थे।

अचानक देवलोक पर एक विपदा आ गई। असुरों ने आक्रमण करके देवताओं को परास्त कर दिया! देवराज इंद्र का आत्मविश्वास हिल गया। वे किसी अज्ञात स्थान पर जा छिपे! लेकिन बाकी देवगण डटे रहे। उन्होनें स्वर्ग वापस छीन लिया। असुरों को भगा दिया।

अब देवताओं ने इंद्र से वापस आने का अनुरोध किया। लेकिन इंद्र नहीं माने। मानते भी कैसे? आप खुद सोचिए! जो राजा मुस…

जटायु: एक अप्रतिम नायक Jatayu: An Unmatched Hero

दोस्तों, आज हम श्रीरामचरितमानस पर अपनी चर्चा को आगे बढ़ाएंगे।
कहते हैं, रामकथा में मानव की सारी समस्याओं के समाधान छिपे हैं। महात्मा गांधी सहित अनेक भारतीय और विदेशी महापुरुषों, विद्वानों तथा विचारकों ने रामराज्य की अवधारणा को प्रशासन का सर्वोत्तम रूप माना है जो रामकथा में वर्णित सिद्धान्तों पर आधारित है।
रामकथा में एक महत्वपूर्ण पात्र है जटायु। वृद्ध लेकिन बलशाली। पद से राजा लेकिन मन से संन्यासी! अधर्म का विरोध करते हुए अपने प्राण देनेवाला कर्मयोगी!


जटायु का जन्म एक विख्यात वंश में हुआ था। उनके पिता अरुण भगवान सूर्य के सारथी थे। शिक्षा पूरी होने के बाद उन्हें पंचवटी एवं नासिक क्षेत्र में निवास करने वाली एक जनजाति का अधिपति बनाया गया जिसका प्रतीक चिन्ह गिद्ध था। इस कारण से उन्हें गिद्धराज जटायु भी कहा जाता है।

दोस्तों, यहाँ एक सवाल लेते हैं। फिल्मों और धारावाहिकों में तो जटायु को पक्षी दिखाया गया है!उन्हें गिद्ध बताया गया है। तो क्या जटायु एक पक्षी थे?

नहीं दोस्तों, बिल्कुल नहीं। यह एक भ्रम मात्र है। वास्तव में जटायु एक जनजातीय राजा थे। उनका प्रतीक चिन्ह गिद्ध था। जिस तरह हम ऑस्ट्रेलि…